हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 359, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुरः ॥ ग्लानिः शोषो भ्रमः श्वासो दैन्यमाशु प्रवर्त्तते ॥ ९ ॥ क्षतक्षयेषु या तृष्णा तस्यां नान्नाभिनन्दनम् ॥ अन्या ज्वरात्तुरे प्रोक्ता तृष्णा सा ज्वरवेगजा ॥ १० ॥ अन्यातिसारे शूूले वा तृष्णा ज्ञेया भिषग्वरैः ॥ ११ ॥ मुखमें शोष हो और जँभाई आवे, शिरमें पीड़ा हो, पेट भारी रहे तब अजीर्णकी तृषा जाननी ॥ ८ ॥ शरीर कृश हो, भूखसे पीडित रहे, ग्लानि, शोष, भ्रम, दीनपना ये शीघ्र उपजें तब रसके क्षयसे उपजी तृषा जाननी ॥९॥ घावसे उपजी तृषामें अन्नमें रुचि न हो, ज्वररोगवालेके ज्वरके वेगसे उपजी तृषा होती है ॥ १० ॥ अतीसारसे और शूलसे भी उपजी तृषा जाननी ॥ ११ ॥ अथ असाध्यतृष्णाका लक्षण । तृष्णातिसारवमनदाहमूर्च्छाभ्रमशोषोद्भवा ॥ तोयेन न याति तृप्तिमसाध्यां तां विजानीहि ॥ १२ ॥ अतीसार, छर्दि, दाह, मूर्च्छा, भ्रम, शोष इनसे उपजी जो तृषा पानीसे शांत नहीं होवे, तब वह असाध्य जाननी ॥ १२ ॥ अथ वातकी तृषाकी चिकित्सा । तृष्णां वातोद्भवां दृष्ट्वा शस्यते सगुडं दधि॥सगुडं वामृताक्वा- थ पीतं वाततृषापहम् ॥ १३ ॥ शुण्ठी च जीर्णा सह शृङ्गवेरं जलेन सौवर्चलयुक्तकल्कः ॥ पिबेत्कषायं च सुशीतलं वा वातोद्भवां चाशु निहन्ति तृष्णाम् ॥ १४ ॥ वातकी तृषा देख गुड़सहित दही हित है अथवा गिलोयके क्वाथमें गुड मिला पीवे । यह बातकी तृषा शांत होती है ॥ १३ ॥ सूंठ, जीरा, अदरख, कालानमक इनका पानीसे पीस कल्क बनावे अथवा क्वाथ बना पीनेसे बातकी तृषा शांत हो जाती है ॥ १४ ॥ अथ पित्तकी तृषाकी चिकित्सा । काश्मर्यं पद्मकोशीरं द्राक्षा मधुकचन्दनम् ॥ वालकं शर्करायु- क्तं क्वाथं पित्ततृषापहम् ॥ १५॥ वटद्रुमो रोध्रसिता च चन्दनं सदाडिमं तण्डुलधावनेन ॥ पिष्ट्व च शीतेन जलेन वापि पीतं च पित्तोत्थतृषापहञ्च ॥ १६ ॥ कुष्ठमुत्पललाजां च न्यग्रोधस्य प्ररोहकान् ॥ संचूर्ण्य शर्करायुक्ता गुटिका तृणिवारणी ॥१७॥