हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १४ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३३ ) मनुष्यको पित्तके अत्यंतपनेसे मूर्च्छा होती है और मनुष्योंके पित्त और वातसे उपजा भ्रम होता है, वात और कफसे अंधेरी करके युक्तहुई तंद्रा होती है और कफ वात और तम इनसे ही नींद होती है ॥ १७ ॥ अथ मूर्च्छाकी चिकित्सा । स्वेदाभिषङ्गविधिमर्द्दनवातशान्त्यै शीतान्नपानव्यजनानिलपि- त्तशान्त्यै॥कषायबहुलस्य सदा प्रशस्तं श्लेष्मोद्भवा विनि- हिता भ्रममूर्च्छना वा ॥१८॥ पाययेत्त्रिफलाक्वाथं शीतं शर्क- रया युतम्॥दुरालभायाःक्वाथञ्च पाययेच्छर्करान्वितम्॥१९॥ पसीना, मालिस, मर्दन ये वातकी मूर्च्छामें हित हैं, शीतल अन्न और पान, बीजनाकी पवन ये सब पित्तकी मूर्च्छामें हित हैं, कसेला पदार्थका पान कफकी मूर्च्छामें हित है ॥१८॥ त्रिफलाके शीतलक्वाथमें खांड़ मिला पीवे अथवा जवासाके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे ये दोनों क्वाथ मूर्च्छाको हरते हैं ॥ १९ ॥ अथ रक्तमूर्च्छाआदिकोंको उपाय । कणां कोलस्य मज्जाञ्च केशरोशीरचन्दनम्॥पिष्ट्वा शीताम्बुना खण्डपानं हन्ति विमूर्च्छितम् ॥२०॥रक्तजां मूर्च्छनां दृष्ट्वा विधेयः शीतलो विधिः॥क्षयजे दुर्बले क्षीणे मूर्च्छापोषणकार- णम्॥२१॥ नष्टचेष्टात्वमापन्ने नरे संचेतनक्रिया ॥ संपीड्य च नवाङ्गुष्ठं नासिकां च प्रपीडयेत् ॥ २२ ॥ दन्तैर्वा सन्दंशैर्वा- पि शनैर्गात्रं प्रपीडयेत् ॥ दाहयेद्वा ललाटे तु पृष्ठदेशे च भालके ॥ २३ ॥ एवं न सिध्यते वापि तदा चान्दोलनं हितम् ॥ २४ ॥ पीपल, बेरकी मज्जा, नागकेसर, खस, चंदन इनको शीतल पानीसे पीस और खांड मिला पीवे यह मूर्च्छाको नाशता है ॥ २० ॥ रक्तसे उपजी मूर्च्छाको देखके शीतल विधि करनी चाहिये । क्षयवाला, दुर्बल,क्षीण इनके मूर्च्छाकी रक्षाका कारण करना ॥ २१॥ जब मूर्च्छासे मनुष्यकी संज्ञा जाती रहे तब मनुष्यको चेतन करानेकी क्रिया करे. अँगूठेको पीडित कर पीछे नासिकाको पीडित करना ॥ २२ ॥ दांतोंसे अथवा नखआदिसे धीरेधीरे शरीरको पीडित करना अथवा मस्तकमें और पृष्ठभागमें दाग देवे ॥ २३ ॥ जो ऐसे भी सिद्धि नहीं होवे तो आंदोलन क्रिया करनी हित है अर्थात् हिंडोलेसे झुलाना हित है ॥ २४ ॥