हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०७ ) गुदजरुधिरपित्तं कासमन्दाग्निशूलान् क्षयतमकहलीमान् काम- लांश्च क्रिमींश्च ॥ विदधति बलपुष्टिं दापयेच्चाशु मार्गे प्रबल- यति हुताशं योगराजः प्रसिद्धः ॥६३॥ योगराजेन युञ्जीत स्मरणेनाप्यगस्त्यतः ॥ अस्य योगस्य योगेन भीमोऽपि बहु- भक्षकः ॥ ६४ ॥ त्रिफला, पीपलामूल, तालीसपत्र, वायविडंग, पीपल, पोहकरमूलको समान भाग लेवे और मिरच, चीता ये दोनों एक भाग, सोंठ एक भाग और इन सबोंके समान जमीकंद ॥ ६१ ॥ मैनफल, गठोना, विधारा, इलायची, भंगराका चूर्ण और दूनी पुरानी खांड इनका वटक अर्थात् गोली बना जो मनुष्य खाता है उसका जठररोग शीघ्र ही दूर होजाता है ॥ ६२ ॥ और गुदाका रक्तपित्त, खांसी, मंदाग्नि, शूल, क्षयरोग, तमक, श्वास, हलीमक, कामला, क्रिमि, इन रोगोंको नाशता है और बल पुष्टि इनको बढ़ाता है जठराग्निको तेज करता है यह सब योगोंका प्रसिद्ध राजा है ॥ ६३ ॥ इस योगराजको अगस्त्यमुनिका स्मरण करके प्रयुक्त करे । इस योगके प्रतापसे भीम भी बहुत भोजनको भक्षण किया करता था ॥ ६४ ॥ अथ चव्याद्यघृत । चव्यं पाठा त्रिकटु मगधा मूलकस्तुम्बुरूणां बिल्वाजाजीरज- निसुरसा पथ्यया सैन्धवं च ॥ पिष्ट्वा चैतत्समगविघृतं पाचये- त्सुप्रयुक्तं पानाभ्यंगे हरति गुदजान्वातरोग़ाश्मरीं च॥ ६५ ॥ चव्य, पाठा, त्रिकटु "सोंठ, मिर्च, पीपल", पीपलामूल, धनियां, बेलगिरी, जीरा, हलदी, तुलसी, हरड़े, सैंधानमक, इनको पीसके बराबरके गौके घृतमें पकावे । यह घृत पीनेसे और मालिस करनेसे गुदाके रोग, पथरी इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ पिप्पल्याद्य तैल । श्यामा कुष्ठं मधुकमदनं पुष्पकं चित्रकञ्च बिल्वं दारु प्रतिवि- षशताह्वाकलिङ्गाशटीनाम्॥पिष्ट्वा तैलं द्विगुणपयसा पाचितं चानुवासे चाभ्यङ्गे वा हितमपि गुदव्याधिनिर्णाशहेतोः॥६६॥ वातव्याधिश्रवणरुधिरे कर्णशूलेऽश्मरीणां जङ्घापृष्ठे कटिशिरः- शिरावेक्षणे वाततोदे॥विष्ठाबन्धग्रहगतगदे मूढगर्भे तथैव श्रेष्ठं तैलं सकलनिचयव्याधिसंधारणेन ॥ ६७ ॥
( ३०८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पीपली, कूठ, मुलहटी, मैनफल, मैनफलका पुष्प, चीता, बेलगिरी, देवदार, अतीशा, शतावरी, इंद्रजव, कचूर, इनको तैलमें पीस फिर दूने दूधमें पका इसको अनुवासन वस्तिमें और मालिसमें बरतैं । यह गुदाकी व्याधिके नाशके हेतुमें हित है ॥ ६६ ॥ वातव्याधि, कानका रुधिररोग, कर्णशूल, पथरी, जांघ, पीठ, कटि, शिर, इनका रोग, नाड़ियोंका फुरणा, वातकी व्यथा, मलका बंधा इनको नाशता है, ग्रहदोषको दूर करता है, मूढगर्भको दूर करता है, यह तैल संपूर्ण व्याधियोंको नाशता है ॥ ६७ ॥ अथ मुस्ताद्यवटक । मुस्ता विश्वविडंगचव्यकशटी पथ्या च तेजोवती दन्तीन्द्रात्रि- वृता समांशकपली मात्रा च प्रत्येकशः॥तस्मादष्टपलांश्च पुष्क- रमपि षड् वृद्धदारोपलान् युञ्ज्यात्षोडशसूरणाख्यसलिल- द्रोणेऽखिलं कल्कितम् ॥६८॥ भूयो वै विपचेज्जलं त्रिगुणितं चोद्धृत्य तत्रैव हि संयुञ्ज्यात्पुनरेव चित्रकत्रिवृत्तेजोवतीसूर- णम्॥एलापत्रकनागकेशरलवंगानां समं चूर्णितमेषां षोडशभा- गयोग्यविहितं सर्वञ्च तं चैकतः ॥ ६९ ॥ स्थाप्यं स्निग्धघटे प्रभातसमये तं चाक्षमात्रं वटं जीर्णे क्षीरमपि प्रभूतमतिमान् पाने तथा भोजने ॥ अर्शोगुल्मभगन्दरांश्च ग्रहणीपाण्डु तथा कामलां शूलञ्चाथ विबन्धकासक्षतजान् हन्त्याशु यक्ष्मां- स्तथा ॥ ७० ॥ नागरमोथा, सोंठ, वायविडंग, चव्य, कचूर, हरडै, तेजबल, जमालगोटाकी जड़, इंद्रायण, निशोत, इन सबोंको समान भाग चार २ तोला प्रमाण लेवे और पोहकरमूल ३२ तोले लेवे विधारा २४ तोले प्रमाण लेवे, जमीकंद ६४ तोला प्रमाण लेवे फिर इनका कल्क बना १०२४ तो० प्रमाण जलमें पकावे ॥ ६८ ॥ पीछे कडा होजावे तब तिगुना जल मिला फिर पकावे पीछे इसको नीचे उतार इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग इनको समान भागले चूर्ण बनाके उसमें मिलादेवे और इनका चूर्ण इन औषधोंसे सोलहवां भाग मिलाना चाहिये ॥ ६९ ॥ पीछे इसको चीकने बरतनमें घाल घरे फिर इसको प्रातःकाल एक तोला प्रमाण भक्षण करे पीछे यह चूर्ण जरजावे तब दूध पीवे और भोजनमें भी दूधको बरतैं तो बवासीर, गुल्म, भगंदर, संग्रहणी, पांडुरोग, कामला, शूल, मलका बंधा, खांसी, क्षतजरोग, राजयक्ष्मा, इन रोगोंको नाशता है ॥ ७० ॥
अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०९ ) अथ भल्लातकगुड । भल्लातकानां द्विसहस्रकाणां द्रोणे जले पाच्यपदावशेषम्॥ क्वाथे तु तस्मिन् विपचेद्गुडस्य तुलाप्रमाणं पुनरेव तत्र ॥ ७१ ॥ भल्लातकानां शतपञ्चकानि तत्रैव संयोज्य पलत्रिकं वा ॥ व्योषं जवानीघन सैन्धवानामेलालवङ्गं दलनागकेशरम्॥ प्रत्ये- ककर्षं तुलितं नियोज्यं न चात्र किञ्चित् प्रविचारणीयम्॥७२॥ संकुट्य तैले घृतभाजने वा स्थाप्यं प्रभाते,वटकप्रमाणम् ॥ भक्षे- द्गुडं यो विनिहन्ति रोगान्भगन्दराशःक्रिमीयक्ष्मपाण्डून् ॥७३॥गुल्माश्मरीमेहहलीमकं वा सरक्तपित्तं ग्रहणीं निहन्ति॥ करोति पुष्टिं बलमातनोति वर्णप्रकर्षं सुखमादधाति ॥ ७४ ॥ दो हजार भिलावोंको १०२४ तोले जलमें पकावे, जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार उस क्वाथमें ४०० तोले गुड़को पकावे ॥ ७१ ॥ पीछे उसमें पांचसौ भिलावे मिलावे और त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, अजवायन, नागरमोथा, सेंधानमक, इलायची, लौंग, तेजपात, नागकेशर, इनको एक २ तोला प्रमाण गेरे ॥७२ ॥ पीछे इनको अच्छी तरह कूटके मिला तैलके अथवा घृतके चीकने पात्रमें घाल धरे पीछे प्रभातसमय इसको वड़ाके प्रमाण भक्षण करे । यह गुड़ भगंदर, बवासीर, क्रिमि, राजयक्ष्मा, पांडु ॥ ७३ ॥ गुल्म, पथरी, हलीमक, रक्तपित्त, संग्र- हणी, इन रोगोंको नाशता है और पुष्टि करता है, बलको बढाता है, वर्णको सुन्दर करता है, सुख करता है ॥ ७४ ॥ अथ अन्यभल्लातकगुड । दशमूलगुडूचीसटीक्षुरकं सहचित्रकभार्ङ्गिफलासहितम्॥ भल्ला- तकपंचशतं प्रदिशेद्विपचेज्जलद्रोणमितेन च तत् ॥ ७५ ॥ गुडजीर्णशतं प्रददेत्कथितमवतार्य्य सुशीतलमेलसमम्॥ दलके- सरभृङ्गलवङ्गयुतं कृतचूर्णमिदं सकलैकमिति ॥ ७६ ॥ घृत- भावितमेकदिनं विदधीद्घृतभाजनके दिनसप्तमिदम्॥ स्निग्धघटे विदधीत मनुष्यो दत्तमिदं गुदजामयसङ्घे ॥७७॥ मोदकमेक- मुषस्सु ग्रसेद्विनिहन्ति गुदामयमेहरुजः ॥ किल कासहलीम- ककामलके हितमेव हुताशनदीप्तिकरम् ॥७८॥ यस्तु शीतजले
( ३१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्षिप्तो जलेनैव विलीयते॥ लोहितो लोहितां याति गुडपाकस्य लक्षणम् ॥ ७९ ॥ दशमूल, गिलोय, कचूर, गोखरू, चीता, भारंगी, त्रिफला, पांचसौ मिलावे, इन्होंने १०२४ तोले जलमें पकावे ॥७५॥ पीछे इस काथमें बराबर पुराना गुड़ मिला पकाके नीचे उतार शीतल हो जावे तब तेजपात, नागकेशर, भंगरा, लौंग इनका चूर्ण बना उसमें मिला ॥७६॥ फिर एक दिनतक घृतमें भावना दे पीछे सात दिनतक घृतके पात्रमें घाल रक्खे पीछे चिकने पात्रमें इसको घाल धरे । इस मोदकको गुदाके रोगोंके समूहोंमें खावे॥७७॥एक मोदक प्रातःकाल खावे । गुदाके रोग, प्रमेह,खांसी, हलीमक,कामला इन रोगोंको नाशताहै और जठरा- ग्निको दीप्त करता है ॥ ७८ ॥ जो जलमें गेरा हुआ डूब जावे और लाल लाल वर्णवाला हो जावे यह गुड़के पाकका लक्षण है ॥ ७९ ॥ अथ भल्लातकावलेह । ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं चविकं त्रिफलामृता॥सहदेवी गजकर्णा- पामार्गश्च कुठेरकम् ॥८०॥ प्रत्येकं चतुष्पालिकं कल्के द्रोणा- म्भसा सुधीः ॥ द्वे सहस्रे समे पिष्टे भल्लातक्याः फलानि तु ॥ ८१॥ पादावशेषे कल्के च लोहचूर्णं तुलार्द्धकम्॥क्षिपेत्कुड- द्वयं सर्पिः सर्वं चैकत्र घट्टयेत् ॥८२॥ फलत्रिकं तथा व्योषं चित्रकं लवणाष्टकम्॥विडङ्गानि समांशानि सर्वाणि पलमात्रया ॥ ८३ ॥ चतुष्पलं वृद्धदारोर्मूर्वाख्या तु चतुष्पला ॥ संशु- ष्कसूरणं कन्दं चूर्णं चाष्टपलोन्मितम् ॥ ८४ ॥ संक्षिप्य स्वादयेच्चूर्णमवतार्य्य सुशीतले॥स्थापितं मधु संयोज्यं कुड- वद्वयमात्रया ॥८५॥ देयं गुदामये चादौ कल्कमप्रातराशने॥ अर्शांसि ग्रहणीरोगं कामलाराजयक्ष्मणः ॥८६ ॥ गुल्मक्रिमी- नश्मरीं च मन्दाग्निमेहशोणितम्॥नाशयत्याशु यक्ष्माणंकरोति बलमाकृतेः ॥८७॥ आशु वृद्धिं प्रकुरुते वलीपलितनाशनम् ॥ रसायनस्य योगेन नरो नागबलो भवेत् ॥ ८८ ॥ गंठोना, चीता, नागरमोथा, चव्य, त्रिफला, गिलोय, सहदेवी, गजपीपली, ऊंगा, ब्वई ॥ ८० ॥ इन सबोंको सोलह सोलह तोल प्रमाण लेवे पीछे कल्क बना एक हजार
अ० ११] भाषाटीकासमेता । (३११) चौवीस १०२४ तोले प्रमाण जलमें पकावे और दोहजार भिलावोंका कल्क बना उसका काथ बनावे ॥८१॥ जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार २०० तोले प्रमाण लोहाका चूर्ण मिलावे और ३२ तोले प्रमाण घृत मिला पीछे एक जगह घोट ॥ ८२ ॥ पीछे त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, आठ प्रकारके नमक, वायविडंग इन सबोंको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ ८३ ॥ और भिदारा १६ तोले, मूर्वा १६ तोले और सूखा हुआ जमीकन्द ३२ तोले प्रमाण लेवे इनका चूर्ण बना उस पाकमें गेर देवे ॥ ८४ ॥ पीछे शीतल हो जावे तब ३२ तोला प्रमाण शहद मिलावे ॥ ८५ ॥ पीछे गुदाके रोगकी निवृत्तिके वास्ते इस कल्कको प्रातःकाल खावे । बवासीर, संग्रहणी, कामला, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है ॥ ८६ ॥ गुल्म, क्रिमि, पथरी, मन्दाग्नि, प्रमेह, रक्तरोग इन रोगोंको नाशता है और बल, आकृति इनको बढाता है ॥ ८७ ॥ धातुओंकी वृद्धि करता है बुढा- पाके सफेद बालोंको दूर करता है। इस रसायनके योगसे मनुष्य हस्तीके समान बलवाला होता है ॥ ८८ ॥ अथ रक्तबवासीरकी चिकित्सा । रक्तार्शसामुपचारं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ प्रातस्तिलान्भक्षयेच्च नवनीतविमिश्रितान् ॥ ८९ ॥ सितानागरकं युक्तं नवनीतं सशर्करम् ॥ केशरं मातुलुङ्गस्य विडंगं शर्करायुतम् ॥ ९० ॥ भक्षेत्कूष्माण्डकालेहं नवनीतेन सशर्करम् ॥ एतेन रक्तगुदजा- ञ्छमयन्ति विचक्षणाः ॥९१॥ समङ्गा शाल्मलीपुष्पं चन्दनं ककुभत्वचम्॥नीलोत्पलमजाक्षीरे पिष्ट्वा पानमसृग्ददे ॥९२॥ कुटजमूलसकेसरमुत्पलं खदिरधातकिमूलशृतं पयः॥ पिबति म्रक्षणयोगमसृग्भवं गुदजनाशनकारिविकारणम् ॥ ९३ ॥ अब रक्तके बवासीरकी चिकित्साको कहते हैं पुत्र ! सुनो, तिलोंको नौनी घृतमें मिला प्रातः भक्षण करे ॥ ८९ ॥ और मिसरी, सोंठ, नौनीघृत, खांड इनको मिला खावे और विजौराकी केशर, वायविडंग, खांड इनको खावे ॥ ९० ॥ अथवा कोहलेको नौनी घृत और खांडके, संग खावे, इन इलाजोंसे वैद्यजन रक्तकी बवासीरोंको शांत करें ॥ ९१ ॥ मंजीठ, सेंवरा पुष्प, चन्दन, अर्जुनवृक्षकी छाल, नीलाकमल, इनको बकरीके दूधमें पीस पीनेसे रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९२ ॥ कूडाकी छाल और जड़, कमलकेशर, खैरकी जड़, धवकी जड़ इनमें दूधको पका काथ बना जो मनुष्य पीता है उसकी गुदाके रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९३ ॥
( ३१२ ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वर्त्तियोग । कुक्कुटस्य पुरीषञ्च तथा पारावतस्य च ॥ गृहधूमं च सिद्धार्थं धत्तूरकदलानि च ॥ काञ्जिकेन च संपिष्य वर्त्ति सञ्चारयेद्गुदे ॥ ९४ ॥ सूरणकन्दकवर्त्तिर्विधेया मल्लीरसेन घृतेन च लिप्त्वा ॥ रोगगुदे गुदकीलकमाशु नाशयेते गुदजांश्च क्रिमींश्च ॥९५॥ हरिद्रा मार्कवं कुष्ठं गृहधूमं सुवर्चलम् ॥ सिद्धार्थकरसश्चैव काञ्जिकेन च पिष्यते ॥ ९६ ॥ मधुना सह वर्त्तिः स्याद्गुदे सञ्चारिता यदि॥ अर्शासां नाशनं चैव करोति सहसा नृणाम् ९७ मुरगाकी बींट, कबूतरकी बींट, घरका धुवां, सरसों, धतूराके पत्ते, इनको कांजीमें पीस गुदामें बत्ती चढानी चाहिये ॥ ९४ ॥ जमीकंदकी बत्ती बना मोगरीके रससे और घृतसे लीपि गुदामें चढ़ानेसे गुदकीलक, गुदाके क्रिमि उन रोगोंका नाश होता है ॥ ९५॥ हलदी, भंगरा, कूट, घरका धुआं, कालानमक इनको सरसोंके रसमें और कांजीमें पीस ॥ ९६ ॥ पीछे शहद मिला बत्ती बना गुदामें चढ़ानेसे शीघ्र ही बवासीररोगोंका नाश होता है ॥ ९७ ॥ अथ देवदाल्यादि लेप । श्योनाकीपलसम्मितञ्च हुतभुग्व्योर्षै रसानां गणान्षड्ग्रन्थापि- चुमन्दवारिककणा भार्ङ्गीशिला तैलकम्॥ पिष्ट्वा श्लक्ष्णसमस्तका- ञ्जिकयुतं दत्त्वा शिलालेपनं दुर्नामानि निहन्त्यथापि गुदजा- न्सर्वातिसारामयान् ॥ ९८ ॥ सोनापाठा, चीता, व्योष अर्थात सोंठ, मिर्च, पीपल इनको चार २ तोला प्रमाण लेवे पीछे इनका रस निकाल लेवे और वच, नींबी, नेत्रवाला, पीपली, भारंगी, शिलाजीत इनको समान भाग ले पीछे तैलमें और कांजीमें तथा पूर्वोक्त औषधोंके रसमें इनको बारीक पीस शिलापै लीप देवे पीछे शिला ऊपरसे उतार गुदापै लगानेसे बवासीर, सब प्रकारके अतीसार इनका नाश होता है ॥९८॥ अथ अर्शरोगपर शस्त्रादिकर्म । यन्त्रं शस्त्राग्निकार्यञ्च कथितं तन्तु शल्यके॥ यथा यन्त्रेण छिद्यन्ते दाहस्तत्र विrate: ॥९९॥ चर्मकीलं तथा छित्त्वा दग्धं क्षारेण धीमता ॥ पक्वजम्बूंसमो वर्णो क्षारदग्धे प्रशस्यते ॥ १०० ॥ दग्धं वा सूरणक्षारं कदलीजीवमुद्गकैः। पलाशकोकिलाक्षारम-
अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१३ पामार्गघृतान्वितम् ॥ १०१ ॥ क्षारदाहे प्रशस्येत नवनीतघृतेन
वा ॥ कुष्ठं पथ्या तथा निम्बपत्राणि च मनःशिला ॥१०२॥ तस्मान्मधुघृतमिश्रं निर्धूमाङ्गारके क्षिपेत्॥धूपयेद्गुदजांतेनयथा
सम्पद्यते सुखम् ॥१०३॥ मनःशिला नागरकं सगुग्गुलं ससा- र्षपम् ॥ देवदारु सपौष्करं विशल्यासर्जजिकारसम् ॥ १०४ ॥
घृतेन धूपयेद्गुदजं गुदामयं भगन्दरम्॥निहन्ति दुष्टपीनसं व्रणं सपूयगन्धिकम् ॥१०५॥ निर्गुण्डीदलशंशुतालमथवा सत्सार्ष-
पं चूर्णकं देवाह्वं घृतशर्करामधुयुतं धूपं गुदायां गते ॥ दुर्नामे सरुजे व्रणे च विषमे दुष्टे विसर्पेषु च पामापीनसकासनाशन-
करो धूपो ग्रहोच्छेदनः ॥ १०६ ॥ यन्त्र, शस्त्र तथा अग्निकर्म कहा है वह शल्यतन्त्रमें कहा है और जो यन्त्रसे छेदन किया
जावे वहां दाह करना चाहिये ॥ ९९ ॥ चर्मकीलको छेदन करके क्षारसे दग्ध करे और जो पक्का हुआ जामनके फलके समान वर्णवाला हो वह क्षारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है
॥ १०० ॥ जमीकन्दका खार, केला, जीवक, मूंग इनके खारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है और केशु, तालमखाना, ऊंगा इनको खारके घृतमें युक्त कर अथवा नौनीघृतमें युक्त कर ॥१०१॥
क्षारदाह करना श्रेष्ठ कहा है और कूठ, हरडै, नींबके पत्ते, मनसिल ॥ १०२ ॥ इनको शहदमें मिला धूवोंसे रहित हुए अंगारपै गेरे पीछे उससे गुदाके मस्सोंके
धूमनी देवे तब रोगीको सुख प्राप्त होता है ॥ १०३ ॥ मनसिल, सोंठ, गूगल, सिरसम, देवदार, पोहकरमूल, कलहारी, साजीखार ॥ १०४ ॥ इनको घृतमें मिला धूप देनेसे बवा-
सीरका मस्सा, गुदाके रोग, भगंदर, दुष्टपीनस, रादिकी गन्धसे युक्त व्रण, इनको नाशता है ॥ १०५ ॥ संभालूके पत्ते, तेजपात, हरताल, सरसोंका चूर्ण, देवदार, इनको घृत,
खांड, शहदमें मिला धूप देनेसे गुदाके रोग दूर होते हैं। पीड़ासहित बवासीर, विषम और दुष्ट विसर्परोग, पामा, पीनस, खांसी, इन रोगोंको नाशता है और यह धूप ग्रहदोषको दूर
करता है ॥ १०६ ॥ अथ अर्शरोगमें पथ्य ।
एवं क्रियाविधिः प्रोक्तश्चातः पथ्यानि मे शृणु ॥ शालिषष्टिक- मुद्गाश्च कुलत्थाढक्यवास्तुकम् ॥१०७॥ चिल्ली च शतपुष्पा च
`` कूष्माण्डकपटोलकम् ॥ कारवेल्लं च तुण्डीरं सूरणो राजिकार्ज-
( ३१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कम् ॥१०८॥ गुडस्तक्रं घृतं चैतत्प्रशस्यन्तेऽर्शसां सदा ॥ सूकरः शल्लकी गोधा मूषको वा सरीसृपः ॥ १०९ ॥ लावति- त्तिरवार्त्ताकमांसानि कथितानि च ॥११०॥ वल्लूरमत्स्यदधि- पिच्छलतैल बिल्ववार्त्ताक भोजनमतिप्रतिवर्जनीयम् ॥ नैसर्गिकं निशि दिवा शयनञ्च शीतं शीतान्तमेव परिवर्जितमादरेण १११ इत्यात्रेय भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अर्शश्चिकित्सा नामै- कादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकारसे क्रियाओंकी विधि कही है । अब पथ्यवस्तुओंको कहते हैं-सालिसंज्ञक चावल, सांठी चावल, मूंग, कुलथी, तुरीधान्य, बथुवा ॥ १०७ ॥ चिल्लीशाक अर्थात् बथुवाके भेद, सौंफ, कोहला, परवल, करेला, तोरी, जमीकंद, सिरसमकी डांकल इनका भोजन और शाक हित कहा है ॥ १०८ ॥ गुड़, तक्र, घृत ये बवासीरवालोंको हित हैं और शूकर, शेह गोह, मूंसा, सर्प आदि ॥ १०९ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, इनके मांस, पथ्य कहे हैं॥११०॥ सूखा मांस, मत्स्यका मांस, दही, झागोंवाला, पदार्थ, तैल, बेलगिरी, बत्तकका मांस, इनका भोजन नहीं करे और रात्रिमें प्रकृतिके अनुसार शयन करे, दिनमें नहीं सोवे और शीतल पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ १११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि- तहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः १२. अथ खांसीकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथ वक्ष्यामि कासानां निदानं सचिकित्सि- तम् ॥ कासांश्चाष्टविधांश्चैव शृणु पुत्र महामते ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-इससे अनन्तर कास अर्थात् खांसीरोगोंका चिकित्सासहित निदान कहते हैं, खांसी आठ प्रकारसे होती है सो हे पुत्र ! हे महामते ! सुनो ॥ १ ॥ अथ कासरोगके हेतु । हास्यात्प्रहास्यरजसानिलसंनिरोधान्मार्गेऽप्यतीव गमनादथ भोजनस्य ॥ वेगावरोधनिरतात्क्षवथोस्तथैव संजायतेऽपि मनुजां प्रतिधाम कासः ॥ २ ॥ संसेवनान्मधुरपिच्छलजाग-
अ० १२] भाषाटीकासमेता । (३१५) रेण स्वप्नैर्दिवातिदधिगौलयहिमाशनैेन ॥ संजायते मदनतैल- मथाल्पकन्दी मद्येन वा किल कफस्य जर्निर्नियुक्ता ॥ ३ ॥ हास्यसे, हँसीके और वायुके रोकनेसे, मार्गमें विशेष गमन करनेसे, भोजनका वेग रोकनेसे, छींकके रोकनेसे, मनुष्योंको खांसी रोग होता है ॥ २ ॥ मधुर तथा झागोंवाले पदार्थके सेवनेसे, जागनेसे, दिनमें सोनेसे और अत्यंत दही, गुल्ली बंधनेवाला पदार्थ, ठण्डा पदार्थ इनके भोजन करनेसे तथा मैनफल, तैल, अल्प कंद, इनके भक्षण करनेसे, मदिरा पीनेसे खांसीमें कफ उत्पन्न होता है ॥ ३ ॥ अथ कासरोगकी संप्राप्ति । ऊर्ध्वं गतोदानविपर्ययेण कफेन प्राणानुगतेन दीर्घः ॥ हृदं निरेत्य कफकासकण्ठे करोति तेनापि च काससंज्ञाम् ॥४॥ कंठमें रहनेवाला उदानवायुके विपरीत होजानेसे कफके संग प्राणवायुके दीर्घ संग होनेसे हृदयमें प्राप्त हुआ कफ खांसीके संग कंठमें प्राप्त हो जाता है उससे खांसी रोग होता है ॥ ४ ॥ अथ कासरोगके प्रकार । कासाश्चाष्टौ समुद्दिष्टाः क्षतजोऽन्यः प्रकीर्तितः॥ वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातकः ॥५॥ वातपित्तसमुद्भूतः श्लेष्म- पित्तसमुद्भवः॥ सप्तमो लोहितेनात्र चाष्टमो जायते क्षयात् ॥६॥ न वातेन विना श्वासःकासो न श्लेष्मणा विना॥ न रक्तेन विना पित्तं न पित्तरहितः क्षयः ॥७॥ कथितः सम्भवः श्वासस्यातो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ येन संलक्ष्यते नृणां कासश्चाष्टविधः परः ॥ ८ ॥ खांसी आठ प्रकारसे भी होती है, एक खांसी क्षतज होती है, वातसे १, पित्तसे २, कफसे ३, सन्निपातसे ४, वातपित्तसे ५, कफपित्तसे ६ और सातमी रक्तसे और आठमी क्षयसे होती है॥ ५॥ ६ ॥ वातके विना श्वास नहीं होता, कफके विना खांसी नहीं होती, रक्तके विना पित्त नहीं होता, पित्तके विना क्षयरोग नहीं होता यह सिद्धान्त है ॥ ७ ॥ श्वासकी उत्पत्ति तो कह दी है अब लक्षण कहते हैं जिससे मनुष्योंको आठ प्रकारकी खांसी जानी जावेगी ॥ ८ ॥
( ३१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातसे उपजी खांसीके लक्षण । क्षीणेन्द्रियः पार्श्वरुजोऽतिवेगः शूलावृत्तो वा गलके च बद्धः॥ निद्राकृतिर्भिन्नरवो मनुष्यो वातेन कासस्य भवेत्प्रकाशः॥९॥ इंद्रिय क्षीण हों, पसलीमें पीडा हो, अत्यंत वेग हो, शूल हो, गलबंधा रहे, निद्रासी आवे स्वर फटा रहे तो वातसे उपजी खांसी जाननी ॥ ९ ॥ अथ पित्तसे उपजी खांसीके लक्षण । कण्ठे विदाहो ज्वरशोषमूर्च्छास्तृष्णाभ्रमः पित्तभवे च कासे ॥ आस्ये कटुत्वं च शिरोऽर्त्तिपित्तं निष्ठीवते पीतनखानि नेत्रे १० कंठमें दाह हो, ज्वर, शोष, मूर्च्छा, तृषा, भ्रम ये हों तब पित्तसे उपजी खांसी जाननी और मुखमें कडुआपान हो, पित्त थूके, शिरमें पीडा हो, नख, नेत्र ये पीले रहें ॥ १० ॥ अथ कफकी खांसीके लक्षण । जाड्यं वमिः पाण्डुभवं च कासं निष्ठीवते यः सघनं कफं वा ॥ भक्तारुचिर्वा कफपूर्णदेहे घनःस्वरःश्लेष्मभवे च कासे॥११॥ जडता हो, वमन हो, पिलास लिये सुफेद और चिकना करडा कफ थूके, भोजनमें अरुचि हो, कफसे पूर्ण शरीर हो, भारी स्वर हो, ये कफसे उत्पन्न हुई खांसीके लक्षण हैं ॥ ११ ॥ अथ त्रिदोषकी खांसीके लक्षण । कण्डूदाहश्वासच्छर्द्दिशोषारोचकपीडिताः ॥ शिरोऽर्त्तिशोफह्र- ल्लासःकासे त्रिदोषसम्भवे॥१२॥कासः कण्डूःपिपासा च कुक्षि- शूलो विनिद्रता ॥शुष्ककासःपिपासा च वातपित्तोद्भवः कफः ॥१३॥ धूमगन्धः पीतवर्णोऽक्षिप्रपाकी सरक्तकः ॥ रक्तनेत्रः पिपासाद्यः पित्तश्लेष्मान्वितः कफः ॥ १४ ॥ खाज हो, दाह हो, श्वास हो, छर्दि हो, शोष हो, अरुचिकी पीडा हो, शिरमें पीडा हो, शोजा हो, थुकथुकी हो, ये त्रिदोषसे उपजी खांसीके लक्षण हैं ॥१२॥ खांसीकी धसक हो, खाज हो, तृषा हो, कुक्षिमें शूल हो, निद्रा नहीं आवे, सूखी खांसी हो तो वातपित्तसे उपजा कफ अर्थात् खांसी जाननी ॥ १३ ॥ धूवां सरीखी गंध हो, पीला वर्ण हो, आंखि पकजावें, कफमें रक्त, अति लाल नेत्र हो तो पित्तकफसे उपजी खांसी जाननी ॥ १४ ॥ अथ क्षतजखांसाक लक्षण । व्यवायातिप्रसङ्गेन वेगरुद्धाभिघातकः ॥ भारोद्धरणयातेन
अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१७ ) जायते क्षतजः कफः ॥१५॥ तेन हृदि व्यथा रूक्षं कासते च स- शोणितम्॥श्वासः संक्षीयते गात्रं दीनो मन्दज्वरातुरः ॥१६॥ वेपते पर्वभेदश्च मोहभ्रमनिपीडितः । एवं क्षतजनिर्दिष्टो नृणां प्राणापहारकः ॥ १७ ॥ मैथुनके अत्यंत प्रसंगसे, वेगके रोकनेसे, अभिघातसे और बोझाके उठानेसे क्षतसे उपजा- हुआ कफ जानना ॥ १५ ॥ उस करके हृदयमें पीडा हो, रूखी खांसी आवे अथवा खांसीमें रक्त आवे, श्वास हो,गात्र क्षीण हुआजावे,गरीब रहे, मंदज्वरकी पीडा रहे, कंपना रहे, हड्फूटन हो, मोह, भ्रम, इनकी पीडा हो ऐसे मनुष्योंके क्षतज अर्थात् चोटसे उपजीहुई खांसी जाननी यह प्राणको हरनेवाली खांसी है ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथ रक्तकी खांसीके लक्षण । अल्पायासात्क्षतात्क्षीणात्संपातात्क्षणभोजनात्॥ पातनाघात- योगेन जायते रक्तजः कफः ॥१८॥ विस्रगन्धास्यहृच्छूलदीनो वै विकलेन्द्रियः ॥ रक्तनिष्ठीवनोपेतः श्वासो वापि मदातुरः ॥ १९ ॥ क्षीयते सततं गात्रं मोहस्तृष्णा च जायते ॥ इत्येतै- र्लक्षणैर्युक्तं रक्तकासं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ कुछ परिश्रम करनेसे, चोटसे, क्षीण होनेसे, गिरनेसे और दुष्टभोजनसे,गिरनेके घातके योगसे रक्तसे उपजाहुआ कफ होजाता है ॥ १८ ॥ मुखमें बुरी गंध आवे, हृदयमें शूल हो, गरीब रहे, इंद्रिय विकल रहें, रक्तके थूकनेसे युक्त हो, श्वास हो, मदसे पीड़ित हो ॥ १९ ॥ शरीर निरंतर क्षीणहुआ जावे, मोह हो,तृषा हो, इन लक्षणोंसे जो युक्त हो वह रक्तसे उपजी खांसी जाननी ॥ २० ॥ अथ सबप्रकारकी खांसियोंके लक्षण । अथ क्षयानुमानेन लक्ष्यते कासलक्षणम् ॥ पाण्डुरोगे तथा यक्ष्मे गुल्मे वापि क्षतक्षये॥२१॥ शोफार्शसां प्रतिश्याये चाव- श्यं काससम्भवः ॥ एतेषां चानुमानेन कासं संलक्षयेद्भृशम् ॥ २२ ॥ स्थवरिणां रक्तकासः सोऽपि याप्यः प्रकीर्त्तितः ॥ बालानां जायते कासो धात्रीवैकल्पयोगतः ॥ २३ ॥ एते
( ३१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थानं-
कासाः समुद्दिष्टा दशभिर्भिषगुत्तमैः ॥ तेषां क्रियाप्रतीकारः पथ्यभेषजमेव च ॥ २४ ॥ इससे अनंतर क्षयके अनुमान करके खांसीका लक्षण कहते हैं । पांडुरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षतक्षय, शोजा, बवासीर, पीनस इनमें अवश्य खांसी होजाती है इनके और अनुमानसे अत्यंत खांसीका लक्षण जानना ॥ २१ ॥ २२ ॥ वृद्ध पुरुषोंको जो रक्तसहित खांसी होती है वह याप्यरोग कहाता है और धायके विकलताके योगसे बालकोंको खांसी उत्पन्न होती है इन दशप्रकारके लक्षणों करके वैद्यजनोंने खांसी कही है सो उनके बंद करनेवाली क्रियाओंको कहते हैं और पथ्य औषधोंको कहते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ वातकी खांसीकी चिकित्सा । शतमूलिकायाः कथितः कषायः पीतः कणाचूर्णयुतः सुखोष्णः॥ नृणां निहन्यान्मरुतोद्भवं तु कासं सशूलं च विपाचनं स्यात् ॥२५॥ भार्ङ्गी शटीगोस्तनिशृङ्गवेरशृङ्गीकणाचूर्णयुतोऽवलेहः॥ गुडेन तैलेन हितो नराणां कासस्य वायोश्च विकारहंता ॥ २६ ॥ नागरं पुष्करं दारु दुस्पर्शकं पिप्पली मुस्तकं रास्ना च शटी ॥ भार्ङ्गिका शर्करा संयुतं चूर्णं कं हन्ति कासं विनिःश्वासवातोद्भवम् ॥ २७ ॥ महाशतावरीका काथ बना उसमें पीपलका चूर्ण मिला सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीनेसे मनुष्योंके वातसे उपजी हुई शूलसहित खांसी दूर होती है और पकजाती है ॥ २५ ॥ भारंगी, कचूर, दाख, अदरक, काकडासींगी, पीपल, इनका चूर्ण बना गुड़में और तेलमें अवलेह बना चाटनेसे वातसे उपजी हुई खांसी दूर होती है ॥ २६ ॥ सोंठ, धमासा, काकड़ासींगी, कचूर, पोहकरमूल, देवदार, भारंगी, पीपल, नागरमोथा, रास्ना इनका चूर्ण बना खांड मिला खानेसे श्वासरहित वातकी खांसी दूर होती है ॥ २७ ॥ अथ कट्फलआदि औषध । कट्फलं रोहिषं धान्यं भार्ङ्गी मुस्ता वचा तथा ॥ कर्कटं पर्पटं दार्वी देवदारु च नागरम्॥२८॥कल्कतं मधुना युक्तं पानमस्य न संशयः॥ कासश्लेष्मप्रतीकारमनेन किल निश्चितम् ॥ २९ ॥ शोषवातक्षयं कण्ठग्रहं पीनसकं कफम् ॥ हिक्कां कफज्वरं चैव नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ३० ॥
४. चतुर्थ स्थान: सूत्र एवं कल्प स्थान (औषध निर्माण, तैल व घृत)
.अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१९ ) कायफल, रोहिषतृण, भारंगी, नागरमोथा, वच, धनिया, पित्तपापड़ा, देवदारु, दारुहलदी, सोंठ, काकड़ासिंगी ॥ २८॥ इनका कल्क बना शहद मिला पीना हित है। इस औषधसे खांसी और कफ दूर होता है ॥२९॥ क्षय, पीनस, कंठग्रह, वातसे उपजा शोष,कफ, हिचकी, कफसे उपजा ज्वर इनको नाशता है ॥ ३० ॥ अथ द्राक्षादि औषध । द्राक्षामलक्याः फलपिप्पलीनां कोलं सखर्जूरयुतोऽवलेहः ॥ निहन्ति कासं क्षयरक्तपित्तान् सकासलं पाण्डु हलीमकञ्च ॥३१॥ दाख, आंवला, पीपल, चव्य, खजूर इन्होंका अवलेह बना चाटनेसे रक्तपित्त, खांसी, क्षयरोग इनका नाश होता है, कामला, पांडुरोग,हलीमक इनको नाशता है ॥ ३१ ॥ अथ वालकादि कल्क । वालाबृहत्यौ मधुकं वृषं च तथैव कुष्ठं पिचुमन्दकञ्च ॥ गवास्तनीसंयुतकल्कमेतत्पानं हितं पित्तकफात्मके च॥ ३२ ॥ नेत्रवाला, छोटी कटेहली, बडी कटेहली, मुलहठी, वांसा, कूट, नींव, दाख इनका कल्क बना पित्तकफसे उपजी हुई खांसीमें पीना हित है ॥ ३२ ॥ अथ मुस्ता चूर्ण । मुस्ताटरूषकफलत्रिकदारुभाङ्गी व्याघ्रीसपुष्पफलमूलदलैरु- पेता॥रास्ना विषातुलसिका विहितं सुचूर्णं क्वाथेन हन्ति किल कासमिदं न चिन्त्यम् ॥ ३३ ॥ बद्धाथवा च गुटिका मधुना गुडेन सिन्धूद्भवैन मगधासमहौषधेन ॥ आस्ये धृता निशि वि- शालगुणा भवन्ति श्वासं क्षयं क्षतजकासमिदं निहन्ति ॥ ३४ ॥ नागरमोथा, वांसा, त्रिफला, देवदार, भारंगी और पुष्प, फल, मूल, पत्ते इन पंचांगोंसहित कटेहली, रास्ना, अतीश, श्रेष्ठ तुलसीके पत्ते, इनका चूर्ण बना, जलमें क्वाथ बना पीनेसे खांसी दूर होती है ॥ ३३ ॥ अथवा इस चूर्णको शहद तथा गुड़में मिला और सैंधानमक, पीपल, सोंठ ये मिला गोली बांध मुखमें धरे । रात्रीके समयमें यह उत्तम गुणवाली कही है और श्वास, क्षय, क्षतसे उपजी खांसी इनको नाशती है ॥ ३४ ॥ अथ पित्तकी खांसीकी चिकित्सा । शर्करा चवखर्जूरं द्राक्षा लाजा कणा मधु ॥ सर्पिर्युतो हितो लेहः पित्तकासनिवारणः ॥३५॥ आटरूषकपत्राणि पिचुमन्द-
( ३२० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- दलानि च ॥ तुलसीस्वरसञ्चैव शटी शृङ्गी मरीचकम् ॥३६॥ शुण्ठीचूर्णं गुडे युक्तं लिह्यात्कासे कफात्मके ॥ भार्ग्याश्च नागपिप्पल्याः पिबेत्क्वाथं सुखोष्णकम् ॥३७॥ आर्द्रकस्य रसं नीत्वा मधुना च पिबेत्सुधीः॥कासे श्वासे प्रतिश्याये ज्वरे श्लेष्मसमुद्भवे ॥ ३८ ॥ कट्फलं भूतृणं भार्गी शुण्ठी पर्पटकं वचा ॥सुराह्वं च जलशृतमुक्तञ्च पण्डितैस्तथा ॥३९ ॥ मधुना संयुक्तं पानं कासे वातकफात्मके ॥ श्वासे हिक्काज्वरे शोषे महा- कासे च दारुणे ॥ ४० ॥ खांड, खजूर, दाख, धानकी खील, पीपल, शहद इन औषधोंके चूर्णमें घृत मिला लेह बना चाटनेसे पित्तकी खांसी दूर होती है ॥ ३५ ॥ वांसाके पत्ते, नींवके पत्ते, तुलसीका रस और कचूर, काकड़ासींगी, मिरच ॥ ३६ ॥ सोंठ, इनका चूर्ण बना गुड़में मिला चाट- नेसे कफसे उपजी खांसी दूर होती है और भारंगी, गजपीपली इनका काथ सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीवे ॥ ३७ ॥ अदरखका रस निकाल शहदके संग पीना खांसी, श्वास, पीनस, कफसे उपजा ज्वर इनमें श्रेष्ठ है ॥ ३८ ॥ कायफल, रोहिषतृण, भारंगी, सोंठ, पित्तपापडा, वच, देवदार इनको जलमें पकावे ऐसे पंडितोंने कहाहै ॥ ३९ ॥ पीछे शहद मिला पीनेसे वात कफसे उपजी खांसी दूर होती है और श्वास, हिचकी, ज्वर, शोष, महा- दारुण खांसी इनमें श्रेष्ठ है ॥ ४० ॥ अथ लघुतालीसआदि औषध । तालीसपत्रं मरिचञ्च विश्वाश्यामायुतं चोत्तरभागवृद्धया ॥ त्वक्पत्रकेणापि लवङ्गमेलामष्टौ कणाया गुणितां सिताञ्च ॥ ॥ ४१ ॥ लिह्यात्प्रभाते श्वसने च कासे प्लीहारुचौ पीनसच्छ- र्द्दिहिक्काम् ॥ शोफातिसारं ग्रहणीं च पाण्डुं क्षयं निहन्यात्क्षतजं च यक्ष्मम् ॥ ४२ ॥ तालीसपत्र १, मिरच २, सोंठ ३, पीपल ४ इनको यथोत्तर वृद्धिभागसे ले और दालचीनी, तेजपात, लौंग, इलायची इनको मिला और पीपलसे आठगुनी मिसरी मिला ॥ ॥ ४१ ॥ फिर प्रभातसमयमें खानेसे श्वास, खांसी, प्लीह अर्थात् तिल्ली, अरुचि, पीनस, छर्दि, हिचकी, शोजा, अतिसार, संग्रहणी, पांडु रोग इन रोगोंका नाश होता है और चोटसे उपजा क्षय, राजयक्ष्मा इनको नाशता है ॥ ४२ ॥
अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३२१ ) अथ बृहत्तालीसाद्य औषध । तालीसं त्रिफलाप्रियङ्गुमगधामूलञ्च मुस्ता शटी दाव्यैलादल- नागकेसरलवङ्गानां तथा नागराः ॥ कृष्णाकोलकबालकं सच- विला मूर्वा विषा कर्कटं द्राक्षा कुष्ठनिशाम्विवत्सकवृषं गोकण्ट- तिक्ता तथा ॥ ४३ ॥ वृक्षाम्लं च सदाडिमाम्लकरसं पक्कं बद- र्याः फलं चैतेषां समभागचूर्णविहितं योज्या समा शर्करा ॥ योज्यं चार्द्धपलं निहन्ति क्षतजं कासं तथा श्वासकं पाण्डुं कामलमेदशोषगुदजे शस्तं सदा यक्ष्मिणाम् ॥ ४४ ॥ तालीसपत्र, त्रिफला, गोंदी, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, देवदार, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, सोंठ, पीपली, कंकोल, नेत्रवाला, चव्य, मूर्वा, अतीश, काकड़ासिंगी, दाख, कूठ, दारुहलदी, चीता, कूड़ाकी छाल, बांसा, गोखरू, कुटकी ॥ ॥ ४३ ॥ बिजौरा, अनारदाना, पके हुए बेर इनको समान भाग ले चूर्ण बनावे और सब चूर्णके समान खांड मिलावे, इस चूर्णको आधा तोला प्रमाण खावे । यह क्षतसे उपजी खांसी, श्वास, पांडुरोग, कामला, मेद, शोष, गुदाके रोग, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है ॥ ४४ ॥ मधुयष्टिका हिता प्रोक्ता क्षये कासे त्रिदोषजे ॥ क्षयसे उपजी हुई खांसीमें और त्रिदोषसे उपजी हुई खांसीमें मुलहटीका सेवन करना हित है ॥ आमजे शूलरोगार्त्तिः पर्वभेदो भ्रमः क्लमः ॥ शोषः शिरोव्यथा क्लेदो नेत्रे गम्भीरमिच्छति ॥ ४५ ॥ आमसे उपजी हुई खांसीमें शूलरोगकी पीडा, संधियोंका भेद, भ्रम, ग्लानि ये होते हैं और शोष हो, शिरमें पीडा हो, ग्लानि हो, नेत्र गंभीर हों ये लक्षण हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ अथ छर्दिलक्षण । खल्ली वा चेतनं वापि अजीर्णाज्जायते वमिः॥सापि स्निग्धा च रूक्षा च द्विविधा जायते वमिः॥४६॥ गम्भीरनेत्रो वमते विड्- बन्धो वाति सार्य्यते ॥ गात्रे खल्लीकरं शूलं तथा शोथाति- मूर्च्छना ॥४७॥ विकलाङ्गो भ्रमार्त्तश्च भ्रमन्तं पश्यते जगत् ॥ शिरोऽर्त्तिर्वेपतेऽत्यर्थं करपादौ हिमोपमौ ॥४८॥ एतैर्लिङ्गैस्तु २१
( ३२२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- संयुक्तां छर्दिं दूरे परित्यजेत् ॥ असाध्या सर्वयोगैस्तु साप्यजीर्णा सुधीमता ॥ ४९ ॥ अजीर्णसे, वमन होनेसे खल्लीरोग हो जावे, मूर्च्छा हो जावे और वमन भी स्निग्ध, रूक्ष ऐसे दो प्रकारकी होती हैं ॥४६॥ जिसके गंभीर नेत्र हों और वमन करे, विष्ठा बन्ध हो, अतिसार हो और शरीरमें खल्ली रोग हो, शूल हो, शोजा हो, अतिमूर्च्छा हो ॥४७॥ अंग विकल हो, भ्रमकी पीडा हो, जगतको भ्रमताहुआ देखे, शिरमें पीडा हो, कांपन हो, हाथ पैर ठंढे हों ॥४८॥ इन लक्ष- णोंसे युक्त जो वमन हो उसको दूरसे ही त्याग देवे और सब योगों करके यह असाध्य है अजी- र्णसे उपजी कहाती है ॥ ४९ ॥ अथ वातच्छर्द्दिकी चिकित्सा । सपञ्चमूलीकथितः कषायः ससैन्धवं चामलकञ्च कल्कः ॥ क्वाथं पिबेन्मिश्रितपिप्पलीकं छद्देश्च वातस्य निवारकञ्च॥५०॥ दद्यात्क्षीरं शर्कराभिर्नरस्य पित्तोद्भूतां वातिशीघ्रं निहन्ति ॥ द्राक्षा वापि क्षीरदाव्यर्या विचूर्णं लेहो हन्ति सारघाणां पिबन्ति॥ ॥५१॥ फलत्रिकं पुष्करकं वचां च तथाभयासैन्धवकं गुडेन ॥ चूर्णं विलिह्यात्कफवान्तिमत्ति नरस्य मूत्रेण युतस्य पानम् ॥ ॥ ५२ ॥ शटी दार्व्यभया शुण्ठी मागधी घृतसंयुता ॥ चूर्णं तक्रेण संयुक्तं हन्ति छर्दिं त्रिदोषजाम् ॥५३॥ रक्तशाल्युद्भवा लाजा मधुशर्करयान्विता ॥ ज्वरात्तिं युवतेः शीघ्रं नाशयंत्येव मे मतम् ॥५४॥ आमलक्या रसेनाथ घृष्टं चन्दनकं मधु ॥ गुटिका पलमानेन लेहो हन्ति वमिं ध्रुवम् ॥५५॥ आर्द्रदाडि- मनिर्यासाश्चाजाजी शर्करान्विता ॥ सतैलं माक्षिकं वापि चत्वारः कवलग्रहाः ॥ ५६ ॥ वाताद्यद्वन्द्वजांश्छर्दीन्निहन्त्येव न संशयः ॥ ५७ ॥ त्रिकटुकरजनीद्वयं च फलत्रिकं मध्वा च यावशूकञ्च ॥ समकृतमिति चूर्णमेतन्मधुना युतं वमिं निवार- यति ॥ ५८ ॥ सगुडं दाडिमद्राक्षापथ्यागुडनागरैर्युक्ता ॥ त्रिवृता नागरमथवा गुडेन युक्तं वमिं दहति ॥ ५९ ॥
अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३२३ ) लघुपंचमूलका क्वाथ बना उसमें सैंधानमक, आंवला, इनका कल्क बना और पीपल मिला इस क्वाथके पीनेसे वातसे उपजी छर्दि दूर होती है ॥ ५० ॥ और दूधमें खांड मिला पीनेसे पित्तसे उपजी छर्दि शीघ्रही नष्ट होती है और दाख, क्षीरविदारी इनके चूर्णका सारघ शहतमें लेह बना पीनेसे पित्तछर्दिका नाश होता है ॥ ५१ ॥ और त्रिफला, पोहकरमूल, चच, हरड़ै, सैंधानमक इनका चूर्ण बना गुड़में मिला चाटनेसे कफकी छर्दि दूर होती है और जिसके ज्यादे मूत्र उतरता हो उसको भी इसीका पीना श्रेष्ठ है ॥ ५२ ॥ और कचूर, देवदार, हरड़ै, सोंठ, पीपल इनके चूर्णको घृतमें अथवा तक्रमें मिला खानेसे त्रिदोषसे उपजी छर्दि दूर होती है ॥ ५३ ॥ और शालीचावलोंकी खीलोंमें शहद और खांड मिला खानेसे शीघ्र ही ज्वरकी पीडाका नाश होता है ॥ ५४ ॥ आंवलाके रसमें चंदनको घिस तिसमें शहद मिला आंवलाके प्रमाण गोली बांधलेवे । यह लेह वमनको निश्चय नाशता है ॥ ५५ ॥ अदरखका रस, अनारदानाका रस, जीरा, खांड, तैल, शहद इनके कवलग्रह अर्थात् ग्रास बनाके मुखमें धारण करे ॥ ५६ ॥ इस ग्रासोंके धारण करनेसे वात आदिक दोषोंसे उपजीहुई तथा दोदोषोंसे उपजी हुई और तीन दोषोंसे उपजीहुई वमन दूर होती है ॥ ५७ ॥ और सोंठ, मिरच, पीपल, हलदी, दारुहलदी, त्रिफला, मदिरा, जवाखार, इनको समान भागले चूर्ण बना शहदमें खानेसे छर्दिका निवारण होता है ॥ ५८ ॥ और अनारदाना, दाख, इन्होंको मिला अथवा हरड़ै, सूंठ, इनको गुड़ मिलाय अथवा निशोथ, सूंठ इनको गुड़में मिला खानेसे वमन दूर होती है ॥ ५९ ॥ अथ पित्तकी छर्दिको चिकित्सा । पर्पटं सगुडं क्वाथं शीतलं पाययेन्नृणाम्॥हन्ति वमिं महाघोरां सपित्तां अस्रसंयुताम् ॥६०॥ काकोली काकमाची च क्वाथं शर्करया युतम्॥लाजाशर्करसंयुक्तं हंति पित्तवमिं नृणाम् ६१॥ मातुलुङ्गरसश्चैव पथ्या शर्करया युतः ॥ हन्ति कासं पित्तभवं वमिं शीघ्रं नियच्छति॥६२॥हृद्वा पित्तवमिं घोरां सदाहभ्रम- दायिनीम् ॥ तस्यारग्वधपत्राणि मधुशर्करयान्वितम् ॥६३ ॥ क्षीरपानं प्रशस्तं वा मुस्ताशर्करयान्वितम् ॥ ६४ ॥ पित्तपापडा,गुड़ इनका क्वाथ बना शीतलकर मनुष्योंको पिलानेसे पित्तसहित और अस्रसहित महाघोर वमन दूर होती है ॥ ६० ॥ काकोली, मकोह, इनका क्वाथ बना उसमें खांड मिला पीनेसे अथवा धानकी खीलोंके रसमें खांड मिला पीनेसे पित्तकी छर्दि दूर होती है ॥ ६१ ॥ बिजौराके रसमें हरड़ैका चूर्ण और खांड मिला पीनेसे पित्तसे उपजी खांसी और वमन दूर
( ३२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
होती है ॥ ६२ ॥ दाह तथा भ्रमवाली घोर पित्तकी छर्दिको देखि तहां अमलतासके पत्तोंकें रसमें शहद और खांड मिला पीना ॥ ६३ ॥ तथा नागरमोथा, खांड ये मिला दूधका पीना श्रेष्ठ कहां है ॥ ६४ ॥ अथ कफकी छर्द्दिकी चिकित्सा । जम्बूवाम्रकप्रवालानि दाडिमामलकं तथा॥ मस्तुनापोषितं पानं हन्त्याच्छ्लेष्मवमिं नृणाम् ॥६५॥ सर्ज्जार्जुनंधवकदम्बकलोलचूर्णं धान्याकशुण्ठिसहितं सगुडं प्रदद्यात् ॥ श्लेष्मोद्भवं वमनमाशु निहन्ति पुंसां लेहस्तथा मधुकणाक्रिमिहाशटीनम् ॥ ६६ ॥ जामुन, आंब इनके कोमल पत्ते, अनारदाना, आंवला, इनको दहीके मस्तुमें पीस पीनेसे मनुष्योंको कफसे उत्पन्न हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६५ ॥ और रालवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, धव कदंब, कंक़ोल, सूंठ, धनियां इनका क्वाथ बना गुड़ मिला पीनेसे कफसे उपजी छर्दि दूर होती है और कचूर, पीपल, शहद, वायविडंग इनका अवलेह बना चाटना हित है ॥ ६६ ॥ अथ एलादिचूर्णं । एलालवङ्गगजकेसरकोलसर्ज्जालाजाप्रियङ्गुघनचन्दनपिप्पली- नाम्॥चूर्णानि मार्कवसितासहितानि लीह्वा छर्दि निहन्ति कफ- मारुतपित्तजाञ्च॥६७॥एलादलानि गजकेसरकत्वगेलालाम- ज्जकं च दहनं च घनं प्रियङ्गुम्॥सचन्दनं मगधजासमचूर्णितञ्च लीह्वा सितासमत्रिदोषवर्मि जघान ॥ ६८ ॥ इलायची, लौंग, नागकेसर, चव्य, रालवृक्ष, धानकी खील, गोंदी, नागरमोथा, चन्दन, पीपल, भांगरा इनके चूर्णमें मिसरी मिला चाटनेसे कफवात पित्त इन दोषोंसे उपजी हुई छर्दि दूर होती है ॥ ६७ ॥ और इलायचीके पत्ते, नागकेशर, दालचीनी, इलायची, रोहिषतृण, चीता, नागरमोथा, गोंदी, चंदन, पीपल इनको समानभाग ले चूर्ण बना मिश्री मिला खानेसे त्रिदोषसे उपजी छर्दिका निवारण होता है ॥ ६८ ॥ अथ छर्दीकी शमनक्रिया । उर्ध्वभागगते दोषे रेचनं तु प्रशस्यते॥ तस्मिञ्झातेऽप्यधोभागं वमनं शाम्यति ध्रुवम् ॥६९॥ अथवा द्विभागगते तदा देया- भया मधु ॥ क्रिमिजं वमनं ज्ञात्वा क्रिमीणां शमनक्रिया ७० वमन व खांसीमें जो दोष उर्ध्वभागोंमें स्थित हो तो जुलाब दिवानी चाहिये और जो
मं० १३ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३५ ) अधोभागमें अर्थात् नीचेके स्थानोंमें दोष प्राप्त होवें तो वमन कराना श्रेष्ठ है ॥ ६९ ॥ और जो नीचे तथा ऊपर दोनों भागोंमें दोष स्थित हों तो हरडै, शहद देने चाहिये और कृमियोंसे उपजे वमनको जानके क्रिमियोंको शांत करनेवाली क्रिया करनी चाहिये ॥ ७० ॥ अथ छर्दिरोगमें पथ्यापथ्य । न चोष्णं नातिचाम्लं च न तीक्ष्णं न तथा लघु॥तण्डुलीय- कशाकं वा न मद्यं काञ्जिकं न तु॥७१॥ वमिदोषे च कथितं पथ्यं चात्र शृणुष्व मे ॥ अनूपं शालिभक्तं च शतपुष्पा च वास्तुकम् ॥७२॥ आढकी मुद्गयूषञ्च दधि गुडघृतान्वितम् ॥ अंगारमण्डका चाथ वमौ पथ्यं प्रशस्यते ॥ ७३ ॥ यथाबलं यथाकालं यथारोगं यथानलम्॥तथा दृष्ट्वा प्रकुर्वन्ति पथ्यानां समुपक्रमम्॥७४॥ दिवा निद्रां प्रयुञ्जीयाद्वमौ श्वासेऽतिसा- रके॥हिक्काशोषे तथाजीर्णे वमिक्लेदेऽथवा पुनः ॥ ७५ ॥ न चोष्णतोयपानञ्च नातिभोजनमेव च ॥ न धावनं न कर्त्तव्यं वर्जयेद्वमनार्दिते ॥७६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने छर्दिचिकित्सा नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ गरम, अत्यंत खट्टा, तीक्ष्ण तथा हलका, चौलाईका शाक, मदिरा, कांजी इनको वमन रोगमें नहीं खावे ॥ ७१ ॥ अब वमनमें पथ्य कहते हैं सुनो । अनूपदेशके जीवोंका मांस, शालिसंज्ञक चावल, सोंफ, बथुवा ॥७२॥ तुरीधान्य, मूंगोंका यूष, दही, गुड़, घृत, अङ्गारोंमें सेके हुंए मांडे ये वमनमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं ॥७३॥ जैसा बल हो जैसा समय हो जैसा रोग हो जैसी जठराग्नि हो तैसे ही पथ्य भोजनोंको विचारके देवे ॥ ७४ ॥ वमन, श्वास, अतीसार इन रोगोंवाले पुरुषों- को दिनमें सुवावे और हिचकी, शोष, अजीर्ण, वमन, ग्लानि इन रोगोंमें भी दिनमें सोना श्रेष्ठ है ॥ ७५ ॥ गरम जल नहीं पीवे, ज्यादे भोजन नहीं करे और वमनसे पीड़ित पुरुषको दांतून नहीं करनी चाहिये ॥ ७६ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां तृतीयस्थाने छर्दिचिकित्सानाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथ तृषा और तालुशोषकी संप्राप्ति । आत्रेय उवाच ॥ भयश्रमाद्गलहीनाद्विदलारूक्षसेवनात् ॥ आतपे
( ३२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- वा ज्वरे जीर्णे क्षयाच्च क्षतजातथा ॥ १ ॥ एतैः संकुपिता दोषा वातपित्तकफास्त्रयः॥ चतुर्थी क्षतजा प्रोक्ता पञ्चमी क्षयजा स्मृता ॥ २ ॥ अजीर्णात्षष्ठी संप्रोक्ता सप्तमी रूक्षसेवनात् ॥ अष्टमी स्याज्ज्वरोत्पन्ना लक्षणानि शृणुष्व मे ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-भय, श्रम, बलकी हीनता इनसे, विदल संज्ञक अर्थात् कुलथी आदि अन्नको सेवनेसे, घामसे और ज्वरसे, अजीर्ण और क्षतसे तथा क्षयसे ॥ १ ॥ इनसे कुपित हुए वातपित्त कफसे तीन प्रकारकी तृषा होती है और घावके होनेसे चौथी और क्षयसे उपजी पांचवीं तृषा होती हैं ॥ २ ॥ अजीर्णसे छठी और रूक्षपदार्थको सेवनेसे सातवीं और ज्वरसे उपजी आठवीं ऐसे तृषा कही हैं उनके लक्षणको मुझसे सुनो ॥ ३ ॥ अथ वातआदि दोषोंसे उपजी तृषाके क्रमसे लक्षण । क्षामः श्यावास्यता चाथ वैरस्यं वेपथुस्तथा ॥ वातेन सा भवे- त्तृष्णा विज्ञेया भिषजां वरैः॥४॥शीततोयाभिलाषश्च भ्रमदा- हप्रलापतः ॥ मूर्च्छा च लोहिते नेत्रे तृष्णा पित्तोद्भवा मता ॥ ॥५॥ निद्रा श्यावास्यतालस्यं बलासोषणाभिलाषता ॥ घन- श्यावांगशैत्यं च श्लेष्मणो जायते तृषा ॥ ६ ॥ कृश शरीर हो जावे और मुख काला हो जावे,मुखमें स्वाद आवे नहीं और कंप उपजे ये लक्षण होवें तब वातकी तृषा जाननी ॥ ४ ॥ शीतल पानीकी इच्छा रहे, भ्रम, दाह, प्रलाप, ये उपजे, मूर्च्छा हो, नेत्र लाल होजावें तब पित्तकी तृषा जाननी ॥५॥ नींद हो,मुख काला हो, कफ पडे, गरम चीजकी इच्छा रहे, कठिन और काला और शीतल ऐसा अंग होजावे तब कफकी तृषा जाननी ॥ ६ ॥ अथ त्रिदोषकी तृषाका लक्षण । दृक्शूलं वमते दाहो भ्रमो वा शिरसो व्यथा ॥ वेपथुश्चाङ्गशैत्यञ्च त्रिदोषप्रभवा तृषा ॥ ७ ॥ नेत्रोंमें शूल चले, छर्दि आवे, दाह और भ्रम हो, शिरमें पीड़ा रहे, कंप हो, अंगोंमें शीत- लता हो, तब त्रिदोषकी तृषा जाननी ॥ ७ ॥ अथ अन्यतृषाओंके लक्षण । वक्त्रशोषो भवेज्जृम्भा शिरोऽर्त्तिर्गुरुतोदरे॥अजीर्णेनाथ मनुजे तृष्णा संलक्ष्यते गदः ॥८॥ रसक्षये यदा तृष्णा तथाक्षमक्षुधा-