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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 548 में से

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पृष्ठ 34

( २ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित, बाधाओंसे रहित, मृगोंके समूहसे व्याप्त और अनेक प्रकारके वृक्षोंसे शोभित हिमालयपर्वतके उत्तर कूल पर बैठे ॥ २ ॥ तरुण सूर्यके समान तेजवाले, तपसे युक्त शुद्ध हुए बिल्लौरी पत्थरके समान श्वेत और भूतिसे भूषित शरीर ॥ ३ ॥ जटाजूटरूपी वनके मूलमें बसनेवाले श्वेतकुंडलोंको धारण किये और बहुतसे शिष्योंसे शोभित, तपस्वी आत्रेयजी महाराजसे ॥ ४ ॥ हारीत नामके शिष्यने इस सम्पूर्ण महाज्ञानको पूछा ॥ ५ ॥ हारीत उवाच ॥ भवन् गुणगणाधार आयुर्वेदविदां वर ॥ विनयाद्विनीतोऽहं पृच्छामि मुनिपुङ्गव ॥ ६॥ कथं रोगसमुत्प- त्तिरुत्पन्नो ज्ञायते कथम्॥ उपचारः प्रचारश्च कथं वा सिद्धिम- च्छति ॥७॥ एतत्सम्यक्परिज्ञानं कथयस्व महामुने ॥ एवं पृष्टो महाचार्यो हारीतेन महात्मना ॥ प्रत्युवाच ऋषिः पुत्रं प्रहस्योत्फुल्ललोचनः ॥ ८ ॥ हारीत बोले-हे पूज्य ! हे गुणोंके समूहके आधार ! हे आयुर्वेदके जाननेवालोंमें श्रेष्ठ ! हे मुनियोंमें उत्तम ! अशिक्षित मैं विनयसे पूछता हूँ ॥ ६ ॥ कैसे रोगकी उत्पत्ति होती है ? उत्पन्न हुआ रोग कैसे जाना जाता है ? रोगकी चिकित्सा और पथ्य कैसे होता है ? और वही रोग कैसे सिद्धिको प्राप्त होता है ? ॥ ७ ॥ हे महामुने ! इस परिज्ञानको अच्छी तरह कहो । इस प्रकार महात्मा हारीतसे पूछे गये खिले हुए नेत्रवाले महा आचार्य आत्रेयजी हँसकर शिष्य हारीतसे बोले ॥ ८ ॥ आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ चिकित्साशास्त्रकुशल वैद्यविद्याविचक्षण ॥ ९ ॥ आयुर्वेदमपा- रन्तु श्लोकानां लक्षसंख्यया ॥ कथं तस्य परिज्ञानं कालेनाल्पेन पुत्रक ॥ १० ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! हे महाप्राज्ञ ! हे सर्वशास्त्रोंमें कुशल ! हे चिकित्साशा- स्त्रमें कुशल ! हे वैद्योंकी विद्याके जाननेवाले ! ॥ ९ ॥ हे पुत्र ! श्लोकोंकी लक्ष संख्यासे युक्त आयुर्वेद अपार है । उसका परिज्ञान थोड़े समयमें कैसे हो सकता है ? ॥ १० ॥ अल्पायुषोऽल्पवक्तारः स्वल्पशास्त्रविशारदाः ॥ अल्पावधारणे शक्ताः कलौ जाता इमे नराः ॥ ११ ॥ अल्पः कलियुगश्चायं नरोपद्रवकारणम् ॥ कथं पुत्र प्रवक्ष्यामि विस्तरेण तवा- गमम् ॥ १२ ॥

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