भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( ३ ) अल्प आयुवाले और अल्प बोलनेवाले और स्वल्प अर्थात् थोड़े शास्त्रको जाननेवाले और थोड़ा धारण करनेवाले अर्थात् अल्पबुद्धि ये मनुष्य कलियुगमें उत्पन्न होते हैं ॥ ११ ॥ यह कलियुग भी अल्परूप है परंतु मनुष्योंके उपद्रवोंका कारण है इसलिये हे पुत्र ! विस्तारसे तुमसे वैद्यक शास्त्र कैसे कहूँ ॥ १२ ॥ यस्य श्रवणकालो यो याति चान्तश्च पुत्रक ! ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणाऽपि वक्ष्यामि शृणु साम्प्रतम् ॥ १३ ॥ चतुर्विंशसहस्रैस्तु मयोक्ता चाद्यसंहिता ॥ तथा द्वादशसाहस्री द्वितीया संहिता मता ॥ १४ ॥ तृतीया षट्सहस्रैस्तु चतुर्थी त्रिभिरेव च ॥ १५ ॥ पञ्चमी द्विकपञ्चशतैः प्रोक्ताः पञ्चात्र संहिताः ॥ तस्माच्चाल्पत- रेणापि वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ १६ ॥ जिस वैद्यकके सुननेका जो समय है वह तत्काल ही समाप्त हो जाता है अर्थात् दिन जाते देर नहीं लगता इसलिये इस समय मैं तुमसे संक्षेप ही में कहूँगा, सुनो ॥ १३ ॥ मैंने चौबीस हजार श्लोकोंसे युक्त प्रथम संहिता कही है और तैसे ही बारह हजार श्लोकोंसे संयुक्त दूसरी संहिता कही है ॥ १४ ॥ और तैसे ही छः हजार श्लोकोंसे युक्त तीसरी संहिता कही है और तीन हजार श्लोकोंसे संयुक्त चौथी संहिता कही है ॥ १५ ॥ और डेढ़ हजार अर्थात् पंद्रहसौ श्लोकोंसे संयुक्त पाँचवीं संहिता कही है। ऐसे पांच संहिता मैने कही हैं इसलिये हे पुत्र ! मैं संक्षेपसे कहूँगा तुम सुनो ? ॥ १६ ॥ येन विज्ञानमात्रेण गदवेदविदो भवेत् ॥ किमत्र बहुनोक्तेन चा- ल्पसारे विशारद ॥ १७ ॥ येन धर्मार्थसौख्यं च तद्धि कर्म समाचरेत् ॥ येन संजायते श्रेयो येन कीर्तिमहत्सुखम् ॥ १८ ॥ तत्कर्म नितरां साध्यं जनानन्दविधायकम् ॥ १९ ॥ जिसके जानने मात्रसे आयुर्वेदको जाननेवाला मनुष्य हो जाता है, हे विशारद ! अल्प,आयु, बुद्धि और बलवाले इस कलिमें अधिक कहनेसे लाभ ही क्या ? ॥ १७॥ जिस कर्मसे धर्म, अर्थ और सुख प्राप्त हो, जिससे कल्याण हो और जिससे कीर्ति तथा महा आनन्द प्राप्त हो वही कर्म करे ॥ १८ ॥ वह कर्म अवश्य करे जो मनुष्योंको आनन्द देनेवाला है ॥ १९ ॥ १ इस संहितामें १०३ अध्याय और ३९१७ श्लोक हैं। मेरी समझमें यह ३ हजार श्लोकवाली संहिता है । १५ वें इसी श्लोकके अनुकूल इस संहितामें सैकड़ों श्लोक एक या दो चरणके हो श्लोक पूर्ण माने गये हैं। वही सब मिलकर ९१७ हो गये हैं । इनमें भी बहुत कुछ सुधारने योग्य सुधारे गये हैं ।