हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-बैल और घोड़ाआदिके बोलनेसे, नाचनेसे, हास्य करनेसे दिनकी नींद और तंद्रा दूर होती हैं और जो रात्रिमें नींद नहीं आवे तब इस क्रियाको करना ॥ १ ॥ काकमाचीकी जड़को चोटीपर बंधानेसे अथवा चोटीके मुखको नीचेकी तर्फ कर बांधनेसे रात्रिको नींद आ जाती है ॥ २ ॥ नींदकी इच्छावालोंके पैरोंके तलुवोंको दहीके पानीसे मर्दित करे और जिसको दिनमें नींद नहीं आती है उसको रात्रिमें नींद आजाती है ॥ ३॥ भय, चिंता, लोभ, इनसे जो रात्रिमें नींद नहीं आवे तब भय, चिंता, लोभ इनको त्यागनेसे नींद आती है ॥४॥ कटेहली, बड़ी कटेहली, वांसा, मकोहविशेष, सांठी, वार्ताकुनामक कटेहलीका भेद इनकी जड़ोंका क्वाथ मनुष्योंको नींद प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ काकजंघा, ऊंगा, तालमखाना, सालवण, इनका क्वाथ बना पीवे अथवा इनकी जड़ोंको शिखा अर्थात् चोटीपर बंधावे ॥ ६ ॥ इति धैरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने निद्राचिकित्सानाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ षोडशोऽध्यायः १६. अथ मदात्ययचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ हालाहलाहलसमं भजते वियोगात् तत्सेवया तु मनुजस्य महापकारः ॥ तृष्णा वमिः श्वसनमोहनदाहतृष्णा संजायतेऽतिसरणं विकलेन्द्रियत्वम् ॥ १ ॥ ये नित्यं सेव- नाद्दुष्टा मद्यस्य मनुजा भृशम् ॥ विषमाहारसदृशी सुरा मोहन- कारिणी ॥२॥ यथा विषं प्राणहरं वियोगाद्योगेन तं चाप्यमृतं वदन्ति॥ तथा सुरा योग्युता हिता स्यादयोगतश्चारभतेऽतिक- ष्टम् ॥३॥ क्षुधातुरे तृषाक्रान्ते सुरा वा भोजनं विना ॥ न च क्षीणैर्विना भक्ता विनाहारातिपानकम् ॥४॥ अत्यशनेऽप्यजी- र्णेऽपि सुरा पीता रुजाकरी ॥ ५ ॥ विशेषयोगसे मदिरा हलाहलविषके समान फलको देती है और मदिराको अत्यन्त पीनेसे तृप्ता, छर्दि, श्वास, मोह, दाह, अतिशारणपना, इन्द्रियोंका विकलपना ये उपजते हैं ॥१॥ जो नित्य मदिराको पीते हैं उनको जो समयपर नहीं मिले तब वह मदिरा विषमभोजनके समान हो जाती है और मोहको करती है ॥२॥ जैसे बुरे योगसे विष प्राणोंको हरता है और अच्छे योगसे विष १ तृष्णा पिपासा तथा अप्राप्ताभिलाषा च ।