हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३३७ ) अमृतके समान हो जाता है वैसे ही योगसे युक्तकरी मदिरा हित है और अयोगसे युक्तकरी अत्यन्त कष्टको करती है ॥ ३ ॥ क्षुधासे पीडितको, तृषासे पीडितको, भोजनसे रहितको, क्षीणको, आहार और पानसे वर्जितको ॥ ४ ॥ भोजनपर भोजन करनेवालेको और अजीर्णवालेको पानकरी मदिरा रोगको करती है ॥ ५ ॥ अथ वातादिदोषजन्य मदात्यय । यस्य प्रलपनं चापि वाचा वातमदात्ययः॥दाहमूर्च्छातिसारश्च ज्वरः पित्तमदात्यये ॥६॥ छर्द्यरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौ- रवम् ॥शीतता च प्रतिश्यायः कफजे च मदात्यये ॥७॥ त्रिषु दोषेषु समता लिंगैर्यैषामुपक्रमः॥स त्रिदोषसमुद्भूतो मदात्ययो भिषग्वर ॥ ८ ॥ जिसके बहुत प्रलाप उपजे उसके वातका मदात्यय जानना और जिसके दाह, मूर्च्छा, अती- सार, ज्वर ये उपजें उसके पित्तका मदात्यय जानना ॥ ६ ॥ जिसके छर्दि, अरोचक, थुकथुकी, तंद्रा, शरीरका गीलापन, भारीपन, शीतलपना, जुखाम ये उपजें उसके कफका मदात्यय जानना ॥ ७ ॥ जिसके तीन दोषोंके लक्षण मिलें उसके सन्निपातका मदात्यय जानना ॥ ८ ॥ मदात्ययकी चिकित्सा । वमनं च प्रशस्तं च निद्रासंसेवनं पुनः ॥ स्नानं हितं पयःपानं भोजने सगुडं दधि॥ ९॥मस्तुखण्डं सखर्जूरं मृद्वीका सारि- वाम्लिका ॥ आमला च परूषं च लेहो हन्ति मदात्ययम् ॥ १० ॥ द्राक्षामलकखर्जूरपरूषकरसेन वा ॥ कल्कयेत्पयसा तत्तु पानं सर्वमदात्यये ॥११॥ पथ्याक्वाथेन संयुक्तं पयःपानं मदात्यये ॥ १२ ॥ वमन, नींदको सेवना, स्नान, दूधका पीना, भोजनमें गुड़ सहित दही ये मदात्ययमें हित हैं ॥ ९ ॥ दहीका पानी, खांड़, छुहारा, मुनक्का, सारिवा, अमली, आंवला, फालसा, इनकी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ १० ॥ दाख, आंवला अथवा छुहारा, फालसा इनके रस करके बनायी चटनी मदात्ययको नाशती है ॥ ११ ॥ सब प्रकारके मदात्ययमें दूधसे कल्क बना पीवे और मदात्ययरोगमें हरडैके क्वाथसे संयुक्त किये दूधको पीना हित है ॥ १२ ॥ २२