भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

( ३६८ ) \qquad हारीतसंहिता । \qquad [ तृतीयस्थाने- अथ सुपारीके मदका निदान और चिकित्सा । पूगीफलमदे कम्पो मोहो मूर्च्छा क्लमस्तमः ॥ प्रस्वेदो विधुरत्वं च लालास्रावश्च जायते ॥ १३॥ भ्रमक्लमपरीतत्वं विज्ञेयं पूग- मूर्च्छिते ॥ मानवो लक्षणैरेभिर्ज्ञेयः पूगविमूर्च्छितः ॥ १४॥ तस्य शीतं जलं पीतं बस्तिर्वा तु हितं भवेत् ॥ शर्करा भक्षणे देया मुस्ता वा शर्करान्विता ॥ १५ ॥ सुपारीके मदमें कंप, मोह, मूर्च्छा, ग्लानि, अँधेरी, पसीना, लारका पड़ना ये उपजते हैं ॥ १३ ॥ इन लक्षणोंके होनेसे मनुष्य सुपारीसे मूर्च्छित हुआ जानना । उसको शीतल पानीका पीना और बस्तिकर्म्म हित कहा है ॥ १४ ॥ इस रोगीको खानेवास्ते अकेली खांड़ अथवा नागरमोथासहित खांड़का देना हित है ॥ १५ ॥ अथ कोदूआदिसे उपजे मदात्ययकी चिकित्सा । कोद्रवाणां भवेन्मूर्च्छा देयं क्षीरं सुशीतलम् ॥ धत्तूरकमदे देयं शर्करासहितं दधि ॥ १६॥ हलिनी करवीरं च मोहिनी मद्य- न्तिका ॥ अन्येषामपि कन्दानां वमनं चाशु कारयेत् ॥ १७॥ पाययेच्छर्करायुक्तं क्षीरं वा दधि शर्कराम् ॥ १८ ॥ इत्यात्रेय- भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मदात्ययचिकित्सा नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ कोदूसे उपजी मूर्च्छामें अच्छीतरह शीतल किया दूध हित है, धतूराके मदमें खांड़सहित दही हित है ॥ १६ ॥ कलहारी, कनेर, भांग, मोगरी, अन्य प्रकारके सब कंद इनके मदोंमें शीघ्र वमनको करवावे ॥ १७ ॥ अथवा खांड़से युक्त किये दूधको अथवा खांड़ते युक्त करी दहीको पान करावे ॥ १८ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा- स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ सप्तदशोऽध्यायः १७. अथ दाहकी संप्राप्ति आदिक । आत्रेय उवाच ॥ समानः संक्रुद्धो रुधिरमपि पित्तं त्वचि गतं नरस्याङ्गे दाहं भवति नितरां घोरमपि च ॥ कदा दन्तोद्धर्षो Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu