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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

( ३४० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्वाथमें खांड मिला पीवे परन्तु यह शीतकषाय बनाके पीना चाहिये । यह मनुष्योंके दाहको और पित्तज्वरको नाशता है ॥ ४ ॥ रोहिषतृण, चन्दन, खस इनका लेप दाहकी शांतिके लिये हित है और दाहवालेको केलाके या कमलपत्तोंकी सेजपर शयन करा ताड़के यामलके वीजनेसे हवा करवावे ॥५॥ दारुहलदीके रससे लेप करना दाहरोगमें हित है और शीतल पानी भी श्रेष्ठ है। वह तृषाको और दाहको निवारण करता है॥६॥ दाहवाले मनुष्यको सीधा शयन करा उसकी नाभिके ऊपर कांसीके पात्रको धर उसमें शीतल पानीकी धारा देनेसे सुख उपजता है ॥ ७ ॥ सुन्दर स्त्रीसे मिलाप होनेसे भी दाह दूर होता है और सौ सौ वार धोये हुए घृतकी मालिस करनेसे भी दाह दूर होता है ॥ ८ ॥ मचकनको अथवा आंवलाको शीतल पानीसे पीस लेप करावे अथवा चटावे तब दाहमें सुख होता है ॥ ९ ॥ जामन, आंव, नींव इनके पत्तोंको बिजौराके रससे पीस लेप करनेसे दाहरोगीको सुख मिलता है ॥ १० ॥ फुहारेका स्थान, चन्द्रमाकी शीतल चांदनी, शीतल पन्ने, शीतल वायु, सफेद चन्दन,कमल, प्रेमका होना, स्त्रीका मिलाप और स्त्रीकी चूंथियोंको मसलना, सफेद वस्त्रको गीला बना धारण करना, दूब, खांड, शंख, लोहा, चांदी ये सब दाहकी शांतिके लिये हित हैं ॥ ११ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविद्वत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने दाहचिकित्सा नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अष्टादशोऽध्यायः १८.

अथ मृगीरोगकी संप्राप्ति आदिक । आत्रेय उवाच॥पित्तं मरुच्च श्लेष्मा च उदानः कुपितो भृशम् ॥ प्राणः शिरसि संकुप्य कुरुते नष्टचेष्टताम् ॥१॥ प्राणाश्नयत्यचै- तन्यं नाडीं चेन्द्रियरोधनम्॥पतते काष्ठवल्लोको मुखे लालां विमुञ्चति ॥ २ ॥ कण्ठञ्च घुर्घुरोयेत फेनमुद्गिरतेऽथवा॥कम्पेते हस्तपादौ च रक्तव्यावर्त्त लोचनम् ॥ ३ ॥ अपस्मारे च लिङ्गानि जायन्ते भिषजां वर ॥ व्यावृत्तं लोचनं क्षामं तमो दाहः शिरोव्यथा ॥ ४ ॥ हताभेन्द्रियसञ्ज्ञश्चापस्मारी विनश्यति ॥ ५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-पित्त, वात, कफ, उदानवायु ये अत्यन्त कुपित होके और प्राण- १ यह एक तरहका शाक होता है ।