हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३४१ ) वायु शिरमें कुपित होके चेष्टाको नष्ट करते हैं ॥१॥ तब चेतन नहीं रहता और नाड़ी भी अचेत हो जाती है और इन्द्रियां रुक जाती हैं और काष्ठकी तरह मनुष्य गिर जाता है और मुखसे लार पड़ती है ॥ २ ॥ कण्ठमें घुर्घुर शब्द होता है अथवा झागको मुखसे गेरता है, हाथ और पैर कंपते हैं और रक्तसे विशेषकरके आवृत हुए नेत्र हो जाते हैं ॥ ३ ॥ हे वैद्यवर ! मृगीरोगमें ये लक्षण होते हैं ॥ ४ ॥ जिसके नेत्र पलट जावें और शरीर कृश हो जावे और अन्धेरी,दाह, शिरमें पीड़ा ये उपजें, इन्द्रियोंकी कांति और संज्ञा जाती रहे ऐसा अपस्मारी अर्थात् मृगी रोगी मर जाता है ॥ ५ ॥ अथ मृगीरोगकी चिकित्सा । तस्य पानाञ्जनालेपमर्द्दनं पानमेव च ॥ अपस्मारे चोपचार्य्य घृतं तैलं च धीमता ॥६॥ अगस्तिपत्रं मरिचं मूत्रेण परिपेषि- तम्॥नस्ये शस्तमपस्मारं हन्ति शीघ्रं नरस्य तु ॥७॥वन्ध्या- कर्कोटिकामूलं घृतं शर्करयान्वितम्॥नस्ये वापि प्रयोक्तव्यम- पस्मारप्रशान्तये ॥ ८ ॥ इस रोगवालेके लिये कुशल वैद्यको पान करनेके पदार्थ, अंजन, आलेप, मर्दन, घृत, तैल, इनसे इलाज करना चाहिये ॥ ६ ॥ अगस्ति वृक्षके पत्तेको और काली मिर्चको गोमूत्रमें पीस नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥ वांझककोड़ी की जड़के रसमें घृत और खांड़ मिला नासिकामें चढ़ानेसे मृगीरोग शांत होता है ॥ ८ ॥ अथ कूष्माण्डलेह । कूष्माण्डखण्डांश्च रसेन पाचिताः सञ्यूषणैलादलनागकेशरम्॥ कुमेथिकाग्रन्थकधान्यकानां समांशकेनापि सिता प्रयोज्या॥ ॥ ९॥ उषस्सु वै भक्षणकं विधेयं तस्योपरि क्षीरमितं प्रशस्तम्॥ विहन्त्यपस्मारविकारमाशु विनाशयेच्छीघ्रमसृग्विकारम्॥१०॥ जलसे पके हुए कोहलेके टुकड़े ले उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, इलायची, तेजपात, नागकेशर, रानीमेथी, पीपलामूल, धनियां इन सबोंके चूर्ण मिला सबोंके समान मिश्री मिलावे, पीछे प्रभातमें खावे और उसके ऊपर प्रमाणसे दूधको पीवे । यह मृगी रोगको और रक्तके विकारको शीघ्र हरता है ॥ ९ ॥ १० ॥ अथ कूष्मांडघृत । कूष्मांडब्राह्मी षड्ग्रन्था शंखपुष्पी पुनर्नवा ॥ सुरसासहितं