भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

( ३४६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्षुभितमनसमार्गत्याज्यमुन्मार्गेयेति ॥३॥ चिन्ताव्यथासुभय- हर्षविमर्षलोभाद्देवातिथिद्विजनरेन्द्रगुर्वपमानात्॥ प्रेमाधिकाच्च युवतौ हितविप्रयोगादुन्मादजन्म च नृणां कथितं वरिष्ठैः ॥४॥ तेन गायति वा रौति विरूपं पठते यदा ॥ लोलयेच्छर्द्दते वापि कम्पते हसते तथा ॥ ५ ॥ धावते हनने चैव तथा जिह्वा विन- श्यति ॥ जवे भासयतेऽत्यर्थं पश्येद्धनमथातुरः ॥ ६ ॥ तस्या- पस्मारकं कर्म कर्त्तव्यं भिषजां वरैः ॥ विशेषेण भूतविद्यामध्ये वक्ष्यामि चाग्रतः ॥ ७ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीय- स्थाने उन्मादनिदानं नामोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ आत्रेयजी कहते हैं:—मनमें होनेवाली व्याधि उन्मादसंज्ञक कहाती है, प्रमत्त अर्थात् बिगड़के बढ़े हुए दोष ऊपरके मार्गमें प्राप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥ तब यह उन्माद रोग होत है यह वैद्यों ने कष्टसाध्य कहा है वह उन्माद वात, पित्त, कफ इनसे और द्वंद्वज होता है और एक सन्निपातसे उन्माद होता है, एक विषसे होता है ॥ २॥ और अशुद्ध होके भयंकर मार्गमें, शून्य मकानमें, वनमें तथा भयवाले गहर मार्गमें, देवताके मंदिरमें, किसी प्रकारसे भयकी शंकासे, खिन्न मन होनेसे मन क्षोभको प्राप्त हो अपने मार्गको त्याग उन्मादको प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥ चिंता, व्यथा, भय, हर्ष, क्रोध, लोभ इनसे और देवता, अतिथि, ब्राह्मण, राजा, गुरुः इनके अपमान करनेसे और अधिक प्रेमवाले जनका तथा स्त्रीका वियोग होनेसे बुद्धिमान् पुरुषों ने उन्मादका हेतु कहा है ॥ ४ ॥ उस उन्मादके होनेसे कभी गावे, कभी रोवे, विरूप हो जावे, कभी पढे, चंचलपना हो, छर्द्दि करे कांपे, हंसे ॥ ५ ॥ मारनेके समय भाग जावे, जिह्वाको छिपा लेवे और वेगसमय अत्यंत तेज हो जावे और पीडित होके वनको देखे ॥ ६ ॥ ऐसे पुरुषके वैद्यजनोंको मृगीरोगमें कहे हुए कर्म करने चाहिये और विशेष करके भूतविद्यामध्यमें इसे कहेंगे ॥ ७ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने उन्मादनिदानं नाम ऊनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ विंशोऽध्यायः २०. अथ वातव्याधिचिकित्सा तहां सोलह प्रकारके शिरोगत प्राणवायुका प्रकोप । आत्रेय उवाच ॥ चतुरशीतिर्विख्याता वाता नृणां रुजाकराः॥