भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० १९ ] भाषाटीकासमेता । ( ३४५ ) तेजपात, नींवकी छाल, कालानमक, असगंध, तालीशपत्र, नागरमोथा, मेदा, महामेदा, देवदार, कूठ, कमल, लोध, मजीठ, शतावरी ॥ ३४ ॥ भारंगी, बेर, अनार, अमली, कंभारी, सिंगाड, पदमाख, तानीवेल, छोटी कटेहली, राक्षा, खिजूरि वे अथवा छुहारे इनके चूर्णमें खांड, घृत, शहद इनको मिला १ तोलभरको चाटे । यह बलको करता है, मृगी रोगको हरता है ॥ ३५ ॥ उन्माद, दारुणरूपी क्षय, राजरोग, पांडु, श्वास्रोग, खांसी, रक्तके रोग, प्रमेहरोग, गुदाके रोग इनको भी नाशता है और स्त्रियोंको हित्त कहा है ॥ ३६ ॥ अथ अन्य उपाय । एतैर्यदि न सौख्यं स्याद्दहेल्लोहशलाकया॥ललाटे च भ्रुवोर्मध्ये दहेद्वा मूर्ध्नि मानवम् ॥३७॥ वर्जयेत्कटुकं चाम्लं रक्तपित्तवि- कारिणाम्॥विशेषेण वर्जनीयं सुरापूगकषायकम् ॥ ३८.॥ न सेव्यानि ह्यपस्मारे मोहमूर्च्छाकराणि वा॥३९॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अपस्मारचिकित्सा नामाष्टा- दशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ जो इन योगोंसे सुख नहीं होवे तब लोहेकी सलाईको गर्म कर मस्तक,भ्रुकुटियोंका बीच, शिर इनमें दाग देवे ॥ ॥ ३७ ॥ चर्चरा, खट्टा, रक्तपित्तविकारवालोंको वर्जित करे, मदिरा, सुपारी,कसैला पदार्थ ॥ ३८ ॥ मोह और मूर्च्छाको करनेवाले पदार्थ इनको मृगी- रोगमें त्यागे ॥ ३९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रयुत्रादितहारीतसंहिता- भाषाटीकायां तृतीयस्थानेऽपस्मारचिकित्सा नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ऊनविंशोऽध्यायः १९. अथ उन्मादानिदान । आत्रेय उवाच॥अयं मानसिको व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः॥ प्रमत्ता ऊर्ध्वगा दोषा ऊर्ध्वं गच्छन्त्यमार्गताम् ॥१॥ उन्मादो नाम दोषोऽयं कष्टसाध्यो भिषग्वरैः॥सोऽपि पृथग्विधैर्दोषैर्द्वन्द्व- जोऽन्यः प्रकीर्त्तितः ॥ तथान्यः सन्निपातेन विषाद्भवति चापरः ॥ २ ॥ अशुचिविपथशून्यागारकेऽरण्यम ध्ये समयगहनवीथी- देवतागारके च ॥ अथ कथमपि भीत्या शङ्कया स्विन्न चेतः