भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५१ ) हृदय बंध रहे पीठ बंध रहे, जांघ बंध रहे, गृध्रसी रोग हो जावे सो जुदे २ बत्तीस प्रकारके रोग पहले व्यान वायुके कोपसे कहे हैं । अब आगे कहे हुए अन्य वायुओंके लक्षणोंको सुनो ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ अथ सोलह प्रकारके समानवायुके कोप । शूलं गुल्म उदावर्त्त आध्मानोदावर्त्तमेव च ॥ परिणामो विषमा- ग्निर्जीर्णं वाति गुल्मकः ॥ ३३ ॥ परिक्लेदी रसशेषो रसश्च मल- वालकः ॥ बन्धी भेदी विलासी च षोडशैते समानतः ॥३४॥ शूल हो, गुल्म, उदावर्त्त, अफारा, परिणामशूल, विषमाग्नि, अजीर्ण, वातका गोला ॥३३॥ परिक्लेद, पीड़ा, रसशेष, रस नहीं पकना, मल कच्चा रहना, मलका बंधा, तथा पतला मल होना, भोग करनेकी इच्छा रहे ये सोलह विकार समान वायुके कोपसे होते हैं ॥ ३४ ॥ अथ सोलह प्रकारके अपानवायुके लक्षण । भगन्दरो बस्तिशूलो मेहार्शाश्चातिकोठकः ॥ लिङ्गदोषौ गुदभ्रं- शस्तथान्यौ गुदशूलकः ॥ ३५ ॥ मूत्ररोधोःविड्रोधश्च षोडशैते विजानता ॥ अपानस्य प्रकोपेन विज्ञेयास्तु प्रधानतः ॥ ३६ ॥ एते विकाराः कथिताः विस्ताराश्च प्रकीर्त्तिताः ॥ दाहः सन्तापः शोषश्च मूर्च्छा पित्तान्वितो मरुत् ॥ ३७ ॥ शैत्यं शोफारुचि- र्जाड्यं वातश्लेष्मसमन्वितम् ॥ यो द्वन्द्वजाश्रितो धीर तं साध्यं मारुतं विदुः ॥ ३८ ॥ केवलोऽपि समीरोऽपि सोऽपि साध्यतमः स्मृतः ॥ ३९ ॥ भगंदर रोग हो, वस्तिमें शूल,प्रमेह, बवासीर, शीत, पित्त, लिंगदोष, गुदभ्रंश, गुदामें शूल ॥ ३५ ॥ मूत्रबंध होना मलबंध होना, ये सोलह विकार वैद्योंको अपानवायुके कोपसे जानने चाहिये ॥ ३६ ॥ ये विकार विस्तार करके यहां कह दिये हैं, और दाह, संताप, शोष,मूर्च्छा ये पित्तवातसे होते हैं ॥ ३७ ॥ शीतलता, शोजा, अरुचि, जडपना ये वातकफसे होते हैं और जो दो दोषोंसे मिला हुआ वायु है उसको साध्य कहते हैं ॥३८॥ तथा एक दोषवाला भी वायु सुखसाध्य कहा है ॥ ३९ ॥ अथ अर्दित अर्थात् लकुआके लक्षण । वक्रं भवति वक्रार्द्धं ग्रीवा चाप्युपवर्त्तते ॥ वैकृत्यं नयनानाञ्च