हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- विसंगो वेदनातुरः ॥ ग्रीवायां गण्डयोर्दन्तपार्श्वे यस्यातिवेदना ॥ ४० ॥ तमर्दितमिति प्राहुर्वातव्याधिविचक्षणाः ॥ ४१ ॥ मुख टेढ़ा हो जावे तथा ग्रीवा ऊपरको हो जावे, नेत्र बिगड़ जावे, वायु बन्ध हो जावे, पीडा रहे और ग्रीवा, कपोल, दांतोंके मसूढ़े इनमें ज्यादे पीडा हो ॥ ४० ॥ उसको व्याधिको जाननेवाले वैद्य अर्दित अर्थात् लकुआ कहते हैं ॥ ४१ ॥ अथ द्वन्द्वज अर्दितका लक्षण । लालास्रावोऽथ शोषश्च हनुग्रहो विरस्यता॥दन्तशूलं भवेद्यस्य वातेनार्दितमेव च ॥४२॥ पीतांगं सज्वरं तृष्णा पित्तजो मोह एव च ॥ शोफस्तम्भोऽस्य भवति कफोद्भूतेऽथवार्दिते ॥४३॥ लार गिरे, शोष हो, ठोड़ी बन्ध रहे, मुखका रस बिगड़ा रहे, दांतोंमें शूल हो ये अर्दित वातके लक्षण हैं ॥ ४२ ॥ पीला शरीर हो, ज्वर हो, तृषा हो, मोह हो ये पित्तसे उपजे अर्दित वायुके लक्षण हैं और शोजा हो गात्र बन्ध रहे ये कफसे उपजे वायुके लक्षण हैं ॥ ४३ ॥ अथ असाध्य अर्दित । भाविनो लक्षणं यस्य वेपथुर्नेत्रमाविलम् ॥ क्षीणस्यानिमिषाक्ष- स्य प्रसक्ताव्यक्तभाषिणः ॥४४॥ न सिध्यत्यर्दितं गाढं विषमं चापि तस्य च ॥ कण्ठो घोरो भक्षणार्थं जृम्भा प्रस्तारिते मुखे ॥४५॥ हनुस्तम्भो भवत्येते कृच्छ्रसाध्या भवन्ति हि ॥ विषमे वा दिवास्वप्ने विवर्तितनिरीक्षणे ॥ ४६ ॥ मन्यास्तम्भं जनयति कृच्छ्रात्पार्श्व विलोकते ॥ वाग्वादिनीं शिरां रुद्ध्वा स्तम्भयेद्रसनानलः ॥ ४७ ॥ रक्ताश्रितोऽपि पवनः शिरो- नाड्यां समाश्रितः ॥ शिरोऽर्तिं कुरुते यस्तु सोऽप्यसाध्यः शिरोग्रहः ॥ ४८ ॥ जिसके कम्पना हो, नेत्र गड जावे, आखोंकी पलक क्षीण हो जावे और अव्यक्त अप्रकट बोले उसके जानना कि अब अर्दित वात होवेगा ॥ ४४ ॥ और जिसके विषम तथा अत्यन्त लक़ुवा वात हो जाता है उसके अच्छा नहीं होता है और जिसका कण्ठ घोर हो, भक्षण करनेके वास्ते तथा जंभाई लेनेके वास्ते फाढा हुआ मुखसरीखा मुख रह जावे ॥४५॥ ठोड़ी बन्द हो जावे ये कष्टसाध्य लकुआके लक्षण हैं और जिसके दिनमें विषम सोनेसे उलटे देखनेके समय ॥४६॥