भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५३ ) ठोड़ीकी नस बन्ध रहें और बगलकी ओर बड़े कष्टसे देखा जावे और वाणीको बोलनेवाली नाड़ीको श्वासवायु बन्ध कर देवे यह भी कष्टसाध्य वात है ॥ ४७ ॥ और रक्तके आश्रय हुआ वायु शिरकी नाड़ियोंके आश्रय हो जो शिरमें पीडा कर देता है वह भी शिरोग्रह- वायु असाध्य कहाता है ॥ ४८ ॥ अथ अपान आदिक वातोंकी चिकित्सा । अतः प्रतिक्रियां वक्ष्ये यथा सिध्यति मारुतः ॥ स्नेहनं रूक्षणं कार्यं पाचनं शमनानि च ॥ ४९ ॥ स्वेदनं मर्दनाभ्यङ्गो बस्तिस्नेहो निरूहणम् ॥ स्नायुसन्ध्यस्थिसंप्राप्ते भेदनं कारये- त्सुधीः ॥ ५० ॥ माणिमन्थेन यन्त्रेण ततः संभूषयानिलम् ॥ असाध्ये शुक्रगे व्याने बीजवत्समुपाचरेत् ॥ ५१ ॥ अब जैसे वायु सिद्ध होता है वैसे चिकित्साको कहते हैं-स्नेहन, रूक्षण, पाचन, शमन ऐसे इलाज करने चाहिये ॥ ४९ ॥ पसीना दिवाना, मालिस करनी, बस्तिस्नेह, निरूहण बस्ति ये चिकित्सा करनी चाहिये और स्नायु, संधि, अस्थि इनमें वायु प्राप्त हो जावे तो भेदन अर्थात् गहावे ॥ ५० ॥ और माणिमंथ यंत्र करके वायुको शांत करे और जो असाध्य व्यानवायु शुक्रमें प्राप्त होवे तो वीर्यवृद्धिसरीखी औषध करे ॥ ५१ ॥ अथ स्नेहननाम घृत । मुण्डी गुडूची बृहतीद्वयं च रास्ना समङ्गा कथितः कषायः ॥ समुत्थितेनापि विमिश्रितं च दुग्धं दधि स्यान्नवनीतकञ्च ५२॥ पचेत्सुधीमान्मृदुवह्निना च सिद्धं घृतं स्नेहनमेव पुंसाम् ॥ कर्षप्रमाणं विहितं च पाने चाभ्यञ्जके भोजनके तथैव ॥५३॥ बस्तौ हितं स्नेहनमेव पुंसां सप्ताहकं वातविकारिणाञ्च॥५४॥ गोरखमुंडी, गिलोय, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, रास्ना, मंजीठ इनका काथ बना लेवे पीछे इस काथमें दूध, दही, नूनीघृत ॥ ५२ ॥ इनको मिला फिर मंद मंद अग्निसे पकावे फिर यह घृत सिद्ध हो जावे तब इसकी मालिस करनी वातवाले पुरुषोंको हित है और एक तोला प्रमाण इसको पीवे अथवा मालिसमें और भोजनमें वरते ॥ ५३ ॥ बातके विकारवाले पुरुषोंको यह घृत सात दिनतक सेवन करना चाहिये ॥ ५४ ॥ अथ निरूहणबस्ति । रास्नाविडङ्गरजनी सह नागरेण सौवीरकेण सुरसा सह सैन्ध- २३