भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५५ ) अथ रसोनकयोग । अर्द्धपलं रसोनञ्च हिङ्गुसैन्धवजीरकैः ॥ सौवर्चलेन संयुक्तं तथैव कटुकत्रिकम् ॥६३॥घृतेन संयुक्तं भक्ष्येन्मासमेकं दिने दिने॥ निहन्ति वातरोगञ्च अर्दितं च प्रतानकम्॥६४॥ एकाङ्गरोगि- णाञ्चापि तथा सर्वाङ्गरोगिणाम्॥ऊरुस्तम्भं क्रिमेदोषं गृध्रसी- र्वापि कर्षति॥६५॥ पलार्द्धञ्च पलं चापि रसोनञ्च सुकुट्टितम्॥ हिङ्गुजीरकसिन्धूत्थं सौवर्चलकटुत्रयम् ॥ ६६ ॥ एभिः संचू- र्णितैः सर्वैस्तुल्यं तैलेन संयुक्तम् ॥ यथाग्नि भक्षयेत्प्रातः रुबु- क्वाथानुपानवत्॥६७॥मासमेकं प्रयोगेण सर्ववातामयाञ्जयेत्॥ एकाङ्गं चैव सर्वाङ्गमूरुस्तम्भं च गृध्रसीः ॥ ६८ ॥ कटिपृष्ठा- स्थिसन्धिस्थमर्द्दितं चापतन्त्रकम्॥ज्वरं धातुगतं जीर्णं नित्यञ्च शीतलाह्वयम् ॥ ६९ ॥ लहसन २ तोले, हींग, सेंधानमक, जीरा, कालानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको समान भाग ले ॥ ६३ ॥ घृतमें मिला दिन २ प्रति एक २ मास प्रमाण भक्षण करे । यह वातरोग, लकवा, प्रतानकवात इनको नाशता है ॥ ६४ ॥ एकांगवातरोग, सर्वांगवात, ऊरुस्तंभ, क्रिमिदोष, गृध्रसी वात इनको दूर करता है ॥ ६५ ॥ चार तोले अथवा दो तोले लहसनको कूट उसमें हींग, जीरा, सेंधानमक, कालानमक, सोंठ, मिर्च, पीपल ॥ ६६ ॥ इन सबोंको समान भाग ले चूर्ण बना उसमें बराबरका तैल मिला फिर प्रातः- काल जठराग्निके अनुसार इसको भक्षण करे और इसपै अरंडके क्वाथका अनुपान करे ॥ ६७ ॥ इसके एक मासे खानेसे सब प्रकारके वातरोगोंका नाश होता है । एकांगवात, सर्वांगवात, ऊरुस्तंभ, गृध्रसीवात ॥ ६८ ॥ कटि, पृष्ठ, अस्थि, संधि इनको मर्दन करनेवाला वात, अपतंत्रकवात, धातुगत ज्वर, तथा जीर्णज्वर और नित्य आनेवाला ज्वर, शीतज्वर इनको नाशता है ॥ ६९ ॥ अथ वातको शमन करनेवाले क्वाथ । नागरा च हरिद्रा च कणाजाज्यजमोदिका॥वचा सैन्धवरास्ना च मधुकं समभागिकम् ॥ ७० ॥ श्लक्ष्णचूर्ण पिबेच्चैव सर्पिषा प्रत्यहं नरः॥एकविंशतिदिनैर्वा रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ७१॥ भवेच्छ्रुतिधरः श्रीमान्मेघदुन्दुभिनिस्वनः ॥ हन्ति वातामयान्