भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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( ३५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

सर्वांल्लिहो यश्च सुखावहः ॥ ७२ ॥ शतावरी वचा शुण्ठी रास्ना कदरशल्लकी॥दशमूली बलाकिण्वस्तुम्बुरु च गुडूचिका ॥ ७३ ॥ एष कल्को घृतैर्युक्तो हन्ति वातं शरीरगम् ॥७४ ॥ शल्लकीचिक्कणीत्वचोक्वाथस्तैलेनसंयुक्तः॥कुर्याद्वातादितंस्वस्थ- मेकविंशतिदिनैर्नरम् ॥ ७५ ॥ अतोऽभ्यङ्गश्च कर्त्तव्यस्तैलैरपि घृतैरपि ॥ गुग्गुलुञ्च रसोनञ्च कारयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ७६ ॥ सोंठ, हलदी, पीपल, जीरा, अज्मोद, वच, सेंधानमक, रास्ना, मुलहटी इनको समान भाग ले ॥ ७० ॥ बारीक चूर्ण बना घृतके संग पीनेसे इक्कीस दिनोंमें वातके रोग नष्ट होते हैं इसमें संदेह नहीं ॥ ७१ ॥ और श्रोत्र इंद्रिय बलवान् हो जाती हैं। मेघके समान स्वर हो जाता है इसमें संदेह नहीं और यह लेह सब प्रकारके वातरोगोंको नाशता है, सुख करनेवाला है ॥ ७२ ॥ शतावरी, वच, सोंठ, रास्ना, छोटा शल्यकी वृक्ष, दशमूल, खरेहटी, मदिरासे बाकी रहा द्रव्य, धनियां, गिलोय ॥ ७३ ॥ इन औषधोंका कल्क बना घृतके संग खानेसे शरीरमें प्राप्त हुए वातका नाश होता है ॥ ७४ ॥ शालवृक्ष, सुपारीका वृक्ष इनकी छालके क्वाथमें तैल मिला मालिस करनेसे इक्कीस दिनमें वातसे पीडित मनुष्य स्वस्थ आनंदित होता है ॥ ७५ ॥ इसवास्ते तैलोंकरके तथा घृत- करके मालिस करनी हित है और विधिपूर्वक लहसनमें गूगलको सिद्ध कर उसका सेवन करना हित है ॥ ७६ ॥ अथ बलाआदिक औषध । भागाश्चाष्टौ बलामूलं चत्वारो दशमूलकम् ॥ क्वाथश्चतुर्गुणे तोयेऽथवा द्रोणस्य संख्यया ॥७७॥ तत्राढकं क्षिपेत्क्षीरमाढकं मिश्रयेद्दधि ॥ कुलत्थाढकयूषं वै चाशु पर्युषितं क्षिपेत् ॥ ॥ ७८॥ तैलं तिलानां द्रोणं तु कटाहै पाचयेच्छनैः॥ जीवन्ती जीवनीया च काकोल्यौ जीवकर्षभौ ॥ ७९ ॥ मेदे द्वे सरलं दारु शल्लक्य कुचन्दनम्॥कालीयकं सर्जरसं मञ्जिष्ठा त्रिसुग- न्धिकम् ॥८०॥ मांसी शैलेयकं कुष्ठं वचा कालाष्टशारिवा ॥ शतावरी चाश्वगन्धा शतपुष्पा पुनर्नवा ॥ ८१ ॥ किण्वकं च सुरा मुस्ता तथा तालीसपत्रकम् ॥ कटुत्रयं वालुकौ च सर्व