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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 548 में से

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पृष्ठ 390

( ३५८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- उसको यह श्रेष्ठ कहा है ॥ ८५ ॥ क्षीण पुरुष, दुर्बल, जीर्णज्वरसे पीड़ित इन पुरुषोंके वास्ते श्रेष्ठ कहा है और आमवात रोगवाले पुरुषोंको इस औषधमें गजपीपली मिलाके देना चाहिये ॥ ८६ ॥ और शुष्क हनुग्रहरोगमें भी इसको प्रभातकालमें खावे और कर्णशूल, अक्षिशूल, मन्यास्तंभ, पशलीशूल इनको नाशता है ॥ ८७ ॥ और यह तैल सम्पूर्ण वातके विकारोंको नाशता है और श्वास, खांसी, गुल्म, बवासीर, संग्रहणी रोग ॥ ८८ ॥ अठारह प्रकारके कुष्ठ रोग इन सबोंको नाशता है और ग्रहदोष, भूत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी ॥ ८९॥ ये सब इस बलातैलके दर्शन करनेसे दूर भाग जाते हैं और मृगी आदि रोग दूर चले जाते हैं ॥ ९० ॥ और वृद्ध पुरुष जवान हो जाता है और वन्ध्या स्त्री पुत्रवाली हो जाती है । यह महाबला आदिक नामवाला तैल महावातरोगोंकोहरने- वाला कहा है ॥ ९१ ॥ अथ बलाआदि तैल । बलाक्वाथाढकं क्षिप्त्वा क्षिपेत्तत्राढकं दधि॥कुलत्थाढकयूषं तु सौवीरस्याढकं तथा ॥९२ ॥ एकत्र कृत्वा विपचेद्योजयेदौष- धञ्च तत् ॥ शतपुष्पा देवदारु पिप्पली गजपिप्पली ॥९३॥ त्रिसुगन्धि सुरामांसी कुष्ठञ्च दशमूलकम् ॥ चूर्णकं निक्षिपेत्तत्र सिद्धं तद्वतारयेत् ॥ ९४ ॥ योज्यं पाने तथाभ्यङ्गे निरूहे नस्यकर्मणि॥हन्ति वातामयाशीतिं श्रेष्ठं गुणगणात्मकम्॥९५ यथा महाबलं तैलं तथेदं गुणवर्द्धनम् ॥ ९६ ॥ २५६ तोले खरेहटीके क्वाथमें २५६ तोले दही मिलावे पीछे उसमें २५६ तोले कुल- थीका यूष मिलावे, २५६ तोले कांजी मिला ॥९२॥ इन सबोंको एक जगह कर आगे कही हुईं औषधोंको मिलावे । सौंफ, देवदार, पीपल, गजपीपल ॥ ९३ ॥ दालचीनी, तेजपात, इलायची, सुरामांसी, कूठ, दशमूल इनके चूर्णको मिला अग्निसे पकावे । सिद्ध हो जाय तब उतार ॥ ९४ ॥ इसको पीनेमें, निरूहवस्तिमें, नस्यकर्ममें वरते और अस्सी प्रकारके वात- रोगोंको यह तैल नाशता है, जैसे पहले कहा हुआ महाबलादिक तैल गुणोंवाला है ॥ ९५ ॥ ऐसे ही यह तैल गुणोंको बढानेवाला और बलप्रद कहा है ॥ ९६ ॥ अथ भृंगराजतैल । भृङ्गराजरसञ्चैव कटुतुम्बीरसं तथा॥सौवीरकरसं चैव क्वाथं वै दशमूलकम् ॥ ९७ ॥ माषकल्माषयूषं च वाजं दधि समा- श्रयेत्॥समांशकानि सर्वाणि तैलं चार्द्धं प्रयोजयेत् ॥ ९८ ॥

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