हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( ३५९ ) मृद्वग्निना पाचनीयं सिद्धं चैवावतारयेत्॥अभ्यङ्गे च प्रयोक्तव्यं न पाने बस्तिकर्मणि ॥ ९९ ॥ पूरणं कर्णरोगेषु शिरःशूले च दारुणे॥अर्द्धशीर्षविकारेषु भ्रुवः शङ्खाक्षिशूलके ॥ १०० ॥ तस्य योगेन मनुजः सुखमापद्यते द्रुतम् ॥ हन्ति कुष्ठं च पामानं त्वग्रोगोऽभ्यञ्जनेन तु ॥१०१॥ शीघ्रं विनाशमाया- ति हन्त्यपस्मारमुत्कटम्॥न बस्तिशूलो भवति वामवाते श्रमः कुमः ॥ १०२ ॥ भंगराका रस, कडुई तूंबीका रस, कांजीका रस, दशमूलका काथ ॥ ९७ ॥ उड़दोंके वाकलोंका यूष अथवा बकरीका दही इनको समान भाग ले और आधा भाग तैल मिल ॥ ९८ ॥ पीछे मंद मंद अग्निसे पकावे । जब सिद्ध हो जावे तब उतारि इसकी मालिस करे और यह तैल पीनेमें तथा वस्तिकर्ममें नहीं बरतना चाहिये ॥ ९९ ॥ और कानके रोग, दारुण शिरकी शूल, इनमें पूरण करना चाहिये और अर्धशिराका विकार, भृकुटि, कन- पटी आंखि इनकी शूल ॥ १०० ॥ इन रोगोंवाला मनुष्य इस तैलके योगसे सुखको प्राप्त हो जाता है और इस तेलकी अच्छीतरह मालिस करनेसे कुष्ठ, पामा इनका नाश होता है ॥ १०१ ॥ मृगीरोग शीघ्र ही नष्ट होता है और बस्तिस्थानमें शूल नहीं रहता है और आमवातमें श्रम और ग्लानि होती है ॥ १०२ ॥ अथ आमपाककी चिकित्सा । आमपाकीति विज्ञेयो न कुर्यात्तस्य पाचनम् ॥ विरेचनं न कर्त्तव्यं स्तम्भनं तस्य कारयेत् ॥१०३ ॥ कटिपृष्ठे वक्षोदेशे तोदनं बस्तिशूलता ॥ गुल्मवज्जठरं गर्जेत्तथान्त्रे शोफमेव च ॥१०४ ॥ शिरोगुरुत्वं भवति वामे च पतति भृशम् ॥ सर्वा- ङ्गो भवेत्सोऽपि विज्ञेयः सुविजानता ॥ १०५ ॥ तस्य च पाचनं कुर्याद्विरेचनं ततः परम्॥विष्टम्भी गुल्मपाकी चसर्वा- ङ्गोऽन्यः प्रकीर्त्तितः॥१०६॥विज्ञेयस्तत्र यःसाध्यश्चान्यौ द्वौ कष्टसाध्यकौ॥स्नेही वामश्च कथितः कृत्वापस्मारनिग्रहम् १०७ जो पुरुष आमपाकी हो उसको पाचन औषध नहीं देवे और जुलाब नहीं दियावे किंतु स्तंभन औषध देवे ॥ १०३ ॥ और कटि, पीठ, छाती इनमें व्यथा, वस्तिमें