हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंपतंग, चन्दन, कूठ, लाल चन्दन ॥ १११ ॥ करंजुवाके बीज, शालवन, तेजपात, दालचीनी, इलायची, सांठी, रास्ना, असगंध, सैंधानमक, जवांसा ॥ ११२ ॥ मीठी तोरी,तुलसी इन सबोंको आठ २ तोला प्रमाण ले चूर्ण बना उसमें पहले कहे क्वाथमें गेर देवे और लाखका रस २५६ तोले ॥ ११३ ॥ शतावरीका रस २५६ तोले, बकरीका दूध चार भाग, गौका दही २५६ तोले और २५६ तोले तिलोंका तैल इनको मिला ॥ ११४ ॥ फिर अग्निसे सिद्ध करे पीछे मंगलाचरण करके इस नारायणनामक तैलको प्रतिष्ठा करके स्थापित कर देवे ॥ ११५ ॥ यह तैल वातके विकारोंको नाशता है और मृगीरोग, ग्रहदोष इनको दूर करता है और शिरके रोग ॥११६॥ कर्णरोग,अठारह प्रकारके कुष्ठ इनको नाशता है । वंध्या स्त्री पुत्रको प्राप्त हो जाती है और नपुंसक भी पुरुषकी तरह आचरण करता है और दुबला पुरुष भी जवानकी तरह आचरण करता है और मूर्ख पुरुष विद्यावान् हो जाता है ॥११७॥ यह नारायण नामवाला तैल कृष्णात्रे- यजीने कहा है ॥ ११८ ॥ अन्यानि घृततैलानि तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ एतेन जायते सौख्यं वातरोगं नियच्छति ॥ ११९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने वातव्याधिचिकित्सा नाम विंशोऽध्यायः२० अन्य भी जो घृत तथा तैल कहे हैं वे सब इस जगह प्रयुक्त करने चाहिये इस कर्मकरके सुख होता है और वातरोग दूर होते हैं ॥११९॥इति वेरिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्त- शाह्यानुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने वातव्याधिचिकित्सानाम विंशोऽध्यायः२०॥ एकविंशोऽध्यायः २१. अथ आमवातचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ लक्षणं शृणु पुत्र त्वं समासेन वदाम्यहम् ॥ गुर्वन्नाहारपुष्टेन मन्दाग्निना व्यवायिनः ॥१॥ तर्पितैः कन्दशा- कैस्तु आमो वायुसमीरितः ॥ श्लेष्मस्थाने प्रपच्यैव जायते बहु- वेदनः ॥ २ ॥ आमातिसारो वर्तेत सन्धौ शोफः प्रजायते ॥ जरत्वञ्चैव गात्राणां बलासपतनं मुखे ॥ ३ ॥ पृष्ठमन्यात्रिके जाते वेदनात्तैर्डपि सीदति ॥ अङ्गं वैकल्यमायाति आमवाते भिषग्वर ॥४॥ तस्य नो स्नेहनं कार्यं पाचनञ्च विधीयते ॥