भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

( ३६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आमं संक्षयते प्राज्ञश्चतुर्धा भेद लक्षणैः ॥ ५ ॥ विष्टम्भी गुल्मकृ- न्स्नेही आमः पक्वाम एव च ॥ सर्वाङ्गगो भवेच्चान्यो वक्ष्ये तस्यापि लक्षणम् ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं- हे पुत्र! आमवातके लक्षणोंको संक्षेपमात्रसे कहते हैं सुनो, भारी अन्नके भोजनसे, मंदअग्निवाले पुरुषके ॥ १ ॥ कसरत नहीं करनेसे, कंद मूलआदिक शाकों- से तृप्त होनेसे वायुसे प्रेरित हुआ आम अर्थात् कच्चा रस सो कफके स्थानमें पकके बहुत पीडा- सहित हो जाता है ॥ २ ॥ उससे आमातिसार होता है। संधियोंमें शोजा हो, अंगोंमें ज्वर बना रहे, मुखसे कफ गिरे ॥ ३ ॥ और पीठ, मन्या कटिआदि त्रिकस्थान इनमें अत्यंत पीडा रहे और हे उत्तम वैद्य ! आमवातरोगमें सब अंग विकल हो जाते हैं ॥ ४ ॥ उस आमवातमें स्नेहन अर्थात् तैलआदिका औषध नहीं करे, पाचन काथ देने चाहिये और चार प्रकारके लक्षणोंसे आमवात होता है ॥ ५ ॥ विष्टंभी अर्थात् मलबंध रहे १, पेटमें गुल्म हो २, स्नेही आम ३, पक्वाम ४ ऐसे चार प्रकारका होता है और एक सर्वांगवात होता है उसका लक्षण भी कहेंगे ॥ ६ ॥ अथ विष्टंभी आमके लक्षण । विष्टम्भी गुरु चाध्मानं बस्तिशूलं च जायते ॥ तस्यापि पाचनं कार्य्यं स्नेहनं नैव कारयेत् ॥ ७ ॥ मल बंध रहे, पेट भारी रहे, अफारा हो, बस्तिमें शूल हो उसका भी पाचन औषध करना चाहिये और स्नेहन औषध नहीं करे ॥ ७ ॥ अथ गुल्मी आमका लक्षण । जठरं गर्जते यस्य गुल्मवत्परिपीड्यते। कटिदेशे जडत्वञ्च आम- गुल्माभिशंकितः ॥ ८ ॥ तस्यादौ लङ्घनानि स्युर्ज्ञात्वा देह- बलाबलम् ॥ पाचनं नैव कर्त्तव्यं गुल्मपाके विमूर्च्छति ॥ ९ ॥ पाचिते चापि गुल्मामे तदाशु मरणं ध्रुवम् ॥ १० ॥ जिसका पेट गर्जता रहे, गोलासरीखी पीडा हो, कटिमें जडता हो वह गुल्मवाला आम कहाता है ॥ ८ ॥ उसकी देहके बलाबलको विचार लंघन कराने चाहिये और पाचन औषध नहीं करावे गुल्मपाक होनेमें मूर्च्छा हो जाती है ॥ ९ ॥ गुल्म आममें पाचन औषध करनेसे शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है ॥ १० ॥ अथ स्नेही आमके लक्षण । यस्य च स्निग्धता गात्रे जाड्यं मन्दाग्निको बली ॥ स्नेहामो