हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमोड़े इनमें बहुतसी पीडा होती है ॥ १ ॥ उसको गृध्रसीवात कहते हैं इसके अन्य लक्षण पहले नहीं कहे हैं ॥ २ ॥ गोड़ोंके मध्यमें पीडा हो, सोजा हो, तीव्र वेदना हो वह वातरक्तसे उपजी हुई कोष्ठशीर्षका कहाती है ॥ ३ ॥ और भुजा, पीठ, अंगुलीमें खाज हो वह करक्रमक्षय- करी अर्थात् हाथके क्रमसे क्षय करनेवाली गृध्रसी कहाती है ॥ ४ ॥ और पैरोंमें जो रोमहर्ष होता है वह पादहर्ष कहाता है और कफवातके प्रकोपके मध्यमें हाथ पैरोंमें पसीना हो जावे ॥ ५ ॥ और पित्तवातके मध्यमें हाथ पैर गरम हो जाते हैं ॥
अथ गृध्रसीवातकी चिकित्सा ।
अमीषां रुधिरस्रावं ततः स्वेदं च कारयेत्॥६॥अभ्यङ्गे वातह- त्तैलं पानं रास्नायाः पञ्चकम् ॥शतावरी बले द्वे च पिप्पली पुष्कराह्वयम् ॥ ७ ॥ चूर्णमेरण्डतैलेन गृध्रसीमपकर्षति ॥ अजमोदादिकं चूर्णमामवाते प्रकीर्त्तितम् ॥ ८॥ तदत्र योज- नीयं च गृध्रसीनां निवारणम्॥एतैर्न जायते सौख्यं दहेल्लोहश- लाकया ॥ ९ ॥ पादरोगेषु सर्वेषु गुल्फे द्वे चतुरङ्गुले॥तिर्य- ग्दाहं प्रकुर्वीत दृष्ट्वा पादे शिरां दहेत् ॥ १० ॥ वातरोगेषु प्रोक्तानि पथ्यानि चात्र योजयेत् ॥ ११ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने गृध्रसीचिकित्सा नाम द्वाविंशो- ऽध्यायः ॥ २२ ॥
इन सबोंमें रुधिरस्राव करावे, पसीना दिवाना चाहिये ॥ ६ ॥ वातको हरनेवाले तैलको मालिसमें वरते और रास्नापंचक आदि औषधोंका क्वाथ पीना चाहिये और शतावरी, खरेहटी, बडी खरेहटी, पीपल, पोहकरमूल ॥ ७ ॥ इनके चूर्णको अरंडके तैलमें मिला पीनेसे गृध्रसी वातका नाश होता है और अजमोद आदि चूर्ण जो आमवात रोगमें कहा है ॥ ८ ॥ वह यहां गृध्रसी वातके निवारण करनेमें देना चाहिये और इन इलाजोंसे यदि सुख नहीं होवे तो लोहकी शलाका करके दग्ध करे ॥ ९ ॥ संपूर्ण पादरो- गोंमें दोनों टंकनोंसे चार अंगुल दाह करे अथवा पैरपे नाड़ीको देख तिरछा दाह करना चाहिये ॥ १० ॥ और वातरोगमें कहे हुए पथ्योंको यहां करे ॥ ११ ॥
इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां गृध्रसीचिकित्सानाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥