भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 401

अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । ( ३६९ ) त्रयोविंशोऽध्यायः २३. अथ वातरक्तका निदान और लक्षण । आत्रेय उवाच ॥ कटुक्षाराम्ललवणै रक्तं देहे प्रकुप्यति ॥ रोधा- त्संधारणाद्वापि दिवास्वप्नादिसेवनैः ॥१॥ समीरकोपः प्रत्यङ्गे युगपद्दृश्यते नृणाम् ॥ वातरक्तमिति प्रोक्तं नृणां देहे प्रवर्त्तते ॥ ॥ २ ॥ जायते सुकुमाराणां तथा स्त्रीणां भिषग्वरा स्थूलानाञ्च विशेषेण कुप्यते वातशोणितम्॥३॥ आलस्यं च तथा कण्डूर्म- ण्डलानाञ्च दर्शनम्॥ वैवर्ण्यं स्फुरणं शोफशोषौ दाहश्च मार्दवम् ॥४॥ वातरक्तं विजानीयाच्छावतां दन्तरक्तयोः॥ एतद्विलक्षणं दृष्ट्वा कर्त्तव्या च प्रतिक्रिया ॥ ५ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कडुआ, खारा, खट्टा, नमक इन भोजनोंके खानेसे शरीरमें रक्त कुपित होता है और मल आदिकोंके वेगके धारण करनेसे, दिनमें सोनेसे ॥ १ ॥ वायुका कोप हो जाता है तब मनुष्योंके अंगमें एक वार वातरक्त कुपित होके दीखता है ॥ २॥ यह रोग सुन्दर बालकोंके तथा स्त्रियोंके होता है और स्थूल शरीरवाले पुरुषके विशेष करके वातरक्त कुपित होता है ॥ ३॥ आलकस हो, खाज हो, शरीरमें मंडलसे दीखे, शरीर विवर्ण हो जावे और स्फुरण और शोजा हो, शोष हो, दाह हो, कोमलपना हो ॥ ४ ॥ दांत, रक्त ये काले हों तब जानिये कि, वातरक्त है ऐसा विलक्षण रोग जानके इसका इलाज करे ॥ ५ ॥ अथ वातरक्तकी चिकित्सा । विरेकं रक्तमोक्षं च पानलेपनलेहकान् ॥ धान्यनागरसंयुक्तं क्षीरं चास्य प्रदापयेत् ॥ ६ ॥ पटोलीनिम्बपत्राणि कथित्वा मधुसंयुक्तम् ॥ पाचनं वातरक्तानां तथा च शमनानि च ॥७॥ काञ्जिकेन च संपिष्य पिचुमन्ददलानि चालेपनं शस्यते तस्य वातरक्तप्रशान्तये ॥८॥ दूर्वा मूर्वा शटी शुण्ठी धान्यकं मधुय- ष्टिका ॥ वर्त्तनं शीततोयेन वातरक्तप्रलेपनम् ॥ ९ ॥ धन्यकर्षञ्च जीरे द्वे गुडेन परिपाचितम्॥ भक्षणे वातरक्तानां दापयेद्दोषशा- २४

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक) · पृष्ठ 401, कुल 548 में से · BharatKosha