भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

( ३७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- न्तये ॥ १० ॥ एतैर्यादि न सौख्यं स्यात्तदा रक्तावसेचनम् ॥ ज्वरे प्रोक्तानि पथ्यानि तानि चात्र प्रदापयेत् ॥११॥ इत्या- त्रेयआषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने रक्तवातचिकित्सानाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ जुलाब दिवानी, फस्त खुलानी, पान, लेप, अवलेह ये क्रिया करनी चाहिये और धनियां, सोंठ इनसे युक्त दूधका पान करना चाहिये ॥ ६ ॥ परवल, नीमके पत्ते इनका क्वाथ बना शहद मिला पीनेसे रक्तवातका पाचन होता है और शमन होता है ॥ ७ ॥ नीमके पत्तोंका कांजीमें पीस लेप करनेसे वातरक्तकी शांति होती है ॥ ॥ ८ ॥ दूब, मूर्वा, सोंठ, कचूर, धनियां, मुलहटी इनको शीतल जलमें पीस लेप करनेसे वातरक्तकी शान्ति होती है ॥ ९ ॥ और १ तोला धनियां, १ तोला दोनों जीरे इनको गुड़में पका भक्षण करनेसे वातरक्त दोषकी शांति होती है ॥ १० ॥ और इनसे जो शांति नहीं होवे तो रक्त निकसावे और ज्वरमें कहे हुए जो पथ्य हैं उनको यहां करवावे ॥११॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने रक्तवातचिकित्सा नाम त्रयोविशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ चतुर्विंशोऽध्यायः २४. अथ अम्लपित्तका निदान । आत्रेय उवाच॥गुडनिषेवणाच्चाम्ले विरुद्धाहारसूचिते॥कुपित- श्चाम्लपित्तञ्च कण्ठस्तेन विदह्यते ॥१ ॥ दाहो वा हृदये तस्य शिरोऽर्त्तिश्चैव जायते ॥ उद्गारानम्लकान् कण्ठे हिक्काम्लोऽपि प्रधावति ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-गुड़का सेवन करनेसे और खट्टा पदार्थ खानेसे, विरुद्ध भोजन करनेसे अम्लपित्त कुपित हो जाता है, उससे कंठ दग्ध होता है ॥ १॥ अथवा उसके हृदयमें दाह होता है और शिरमें पीड़ा होती है और कंठमें खट्टी २ डकार आती हैं खट्टी हिचकी भी आती है ॥ २ ॥ अथ अम्लपित्तकी चिकित्सा । शृणु तस्य प्रतीकारं वमनं कारयेद्द्रुतम् ॥ अधोगते चाम्लपित्ते विरेकश्च प्रदीयते ॥३॥ पारिभद्रदलानीति आमलक्याः फला-