भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

( ३७४ ) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- हस्ती, भैंस, बैल इनके मूत्रमें धानकी खील और पीपल मिला काथ बनाके पीनेसे शीघ्र ही शोजाका नाश होता है और अरंडीके तेलमें दूध मिला पीनेसे भी शीघ्र ही नाशता है॥ ॥ १५ ॥ अंडके पत्तोंसे अथवा अमलीके पत्तोंसे वारंवार स्वेदनक्रिया अर्थात् पसीना दिवावे ॥ १६ ॥ बालछड़, कडुई तुंबी, इनको कांजीमें अथवा जलमें औटाय गरम २ जलसे पसीना दिवावे अथवा इनके ही गरम करके पसीना दिवावे ॥ १७ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहाय० हारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीय- स्थाने शोफचिकित्सा नाम पंचविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ षड्विंशोऽध्यायः २६. ꕤ अथ गुल्मनिदान और लक्षण । आत्रेय उवाच॥श्वयथूत्थैरुपचारैस्तैरनिलः कुप्यते यदा॥मन्दा- ग्निना विषमेण गुल्मं जठरे जायते ॥१॥ उदरं गर्जते यस्य विष- माग्निश्च दृश्यते॥ तोदो वपुषि शूलं च वातगुल्मं विनिर्दिशेत् ॥२॥ शोषोऽरतिः सपीतत्वं मन्दज्वरनिपीडिनम् ॥ तमोभ्रम- पिपासार्त्तिर्गुल्मं तत्पित्तसम्भवम् ॥३॥ शोषो जाड्यञ्च हल्लास- स्तन्द्रालस्यं सशीतकम् ॥ मन्दाग्निर्विड्विबन्धश्च गुल्मं तच्छ्ले- ष्मसम्भवम् ॥४॥ मोहो विभ्रमता जाड्यमरतिः क्षुत्पिपासकम्॥ आलस्यं निद्रितावेश्यं गुल्मं तत्कफपैत्तिकम् ॥ ५ ॥ निद्राल- स्यञ्च दाहश्च शोफाच्छूलं च सज्वरम् ॥ वैवर्ण्यमरतिर्जाड्यं विड्बन्धो विकलाङ्गता ॥६॥ तथातिसारो मूर्च्छा च तृड्हल्ला- सश्च वेपथुः ॥श्वासोऽरुचिरजीर्णत्वं गुल्मं तत्सान्निपातिकम् ॥ ॥७॥ साध्यं केवलदोषोत्थं द्वन्द्वं कष्टेन सिध्यति ॥ असाध्यं सन्निपातोत्थं वक्ष्यामस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥ ८ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-शोजेसे उत्पन्न हुए उपचारोंकरके वायु जब कुपित हो जाता है तब मन्द अग्निसे और विषम अग्निसे उदरमें गुल्म अर्थात् गोला उत्पन्न हो जाता है ॥ १ ॥ जिसका उदर गर्जे और विषम अग्नि दीखे, शरीरमें व्यथा हो और शूल हो वह वातसे उपजा