हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७३ ) इन्होंसे युक्त ये सब शोजें वर्ज देने अर्थात् असाध्य हैं ॥ ८ ॥ और श्रम, ज्वर इनसे क्षीण हुए शरीरमें जिस पुरुषके शोजाकी पीडा होती है वह वैद्यजनोंने असाध्य कही है. हे उत्तमवैद्य ! वह शोजाकी पीडा साध्य नहीं है ॥ ९ ॥ वातसे उपजे शोजेमें व्यथा हो, रूखा शोजा हो, श्वास हो, पित्तके शोजेमें श्रम हो, दाह हो और कफसे उपजा शोजा शीतल और कडा हो, खाजकी पीड़ा होती है और दो दोषोंसे उपजे शोजेमें दो दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ १० ॥ अब इस शोजेका इलाज कहते हैं। पसीना देना, पाचन और शोधन औषध देनी, जुलाब दिवानी, फस्त खुलानी, क्वाथपान ये विधि शोफ रोगमें कही हैं ॥ ११ ॥ शोजाकी आदिमें तेलआदि औषध और रूखी औषध नहीं करनी चाहिये किंतु आगे कही हुई औषधोंको पाचनके वास्ते देवे ॥ १२ ॥ अथ पुनर्नवादि क्वाथ । कंकोल शुण्ठि मगधा च पुनर्नवा च निम्बाभया च कटुका च पटोलदार्बी ॥ क्वाथः सुखोष्णक्वथितस्तु विपाचनेन शोफो जहाति जठरं च नरस्य शीघ्रम् ॥ १३ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, सांठी, नींव, हरड़ै, कुटकी, परवल, दारुहलदी इनका क्वाथ बना गरम २ पीना पाचन कहा है और मनुष्यके उदरमें प्राप्त हुआ रोग और शोजेको शीघ्र ही नाश देता है ॥ १३ ॥ अथ अन्य उपाय । पुनर्नवा गुडूची च गुग्गुलुं समकल्कितम् ॥ हन्ति गुल्मोदरांश्चैव शोषदोषान्कफांस्तथा ॥ १४ ॥ सांठी, गिलोय, गूगल इनको समान भाग ले कल्क बना खानेसे शोजा, गुल्मरोग, उदररोग, कफरोग इनका नाश होता है ॥ १४ ॥ हस्ती महिष्या वृषभस्य मूत्रं तथैव लाजं सकणं प्रयोज्यम् ॥ पानेन शोफो विजहाति शीघ्रमेरण्डतैलेन युतं पयो वा ॥ १५ ॥ संस्वेदनक्रिया तत्र कार्या चैव पुनः पुनः ॥ एरण्डपत्रैर्वापि अथवा तिन्तिडीच्छदैः ॥ १६ ॥ लोमशा कटुतुम्बी च काञ्जिकेन जलेन वा॥ निष्क्वाथ्य चापि संस्वेदस्तथैवोष्णेन तेन च॥१७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने शोफचिकित्सा नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥