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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 548 में से

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पृष्ठ 408

( ३७६ ) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- उस दूधके समान दही मिला फिर उसीके समान घृत मिलावे, फिर मंद २ अग्निसे पकावे । जब घृतमात्र बाकी रह जावे तब सिद्ध हुआ जानके उतार लेवे ॥ १३ ॥ पीछे इसको पात्रमें घाल धरे इसको पीनेमें और मालिसमें वरते । स्नेह सात प्रकारका होता है इस- वास्ते रूक्षण कर्म करना हित है ॥ १४ ॥ अथ शुंठादि पानक । दिनत्रयञ्च कर्त्तव्यं कथयाम्यत्र कोविद् ॥ शुण्ठी सौवर्चलं जीरे द्वे वा हिङ्गुसमन्वितम् ॥ १५ ॥ काञ्जिकं पानमेतेषां रूक्षणं गुल्मशान्तये ॥ चिकित्सितेऽत्र गुल्मस्य क्षारपाकं प्रयोजयेत् ॥ १६ ॥ तीन दिनतक रूक्षण कर्म करे सो कहते हैं-सोंठ, काला नमक, दोनों जीरे, हींग इनको ॥ १५ ॥ कांजीमें मिला पान करना यह गुल्मकी शांतिके वास्ते रूक्षण कर्म कहा है और यहां गुल्मकी चिकित्सा में क्षारपाकयुक्त करना भी श्रेष्ठ है ॥ १६ ॥ अथ विरूक्षण । क्षारं पलाशार्जुनसूरणस्य तथैव क्षारं सहयावशूकम् ॥ सौवर्चलं सिन्धुभवोद्भिदञ्च सामुद्रजं वापि विमिश्रयेच्च ॥ १७ ॥ तोयं परिस्राव्य विधानतोऽपि युक्तं तथैतानि सदौषधानि॥ पथ्या- ग्रिशुण्ठीरजनीसुराह्वं कुष्ठं विशाला च जवानिका च ॥ १८॥ तथाजमोदा सह जीरके द्वे षड्ग्रन्थिका हिङ्गुयुतं च चूर्णम् ॥ क्षारोदकापानविमिश्रपानं निहन्ति सर्वाण्यपि कोष्ठजानि ॥ १९॥ गुल्मानि सर्वाणि विषूचिकानां मन्दाग्निशूलानि भगन्दराणाम्॥प्लीहोदरानाहनविड़विबन्धं विनाशयेद्रोगत्रयं नराणाम् ॥ २० ॥ टेशू, अर्जुनवृक्ष, जमीकंदका खार, जवाखार, कालानमक, सेंधानमक, रेही इनका खार, खारीनमकका खार इनको एकत्र मिलाय ॥ १७ ॥ जलमें उतार पीछे विधिसे इन औषधोंको गेरे । हरडै, चीता सोंठ, हलदी, देवदार, कूंठ, इंद्रायण, अजवायन ॥ १८ ॥ अजमोद, दोनों जीरे,वच, हींग इनके चूर्णको उन क्षारोंके संग पीवे । यह कोष्ठमें उपजे हुए सब विकारोंको नाशता है ॥ १९ ॥ और सब प्रकारके गुल्म, विषूचिका, मंदाग्नि, शूल,भगं- दर, प्लीहोदर, अफारा, विड्वंध इन सब रोगोंको नाशता है ॥ २० ॥

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