हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 411, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ] भाषाटीकासमेंता । ( ३७९ ) नाश करती है ॥ ३६ ॥ सोंठ, कालानमक, हरड़ै, वायविडंग, सांठी, ऊंगाके बीज इनका चूर्ण बना थोहरके दूधमें भावना दे ॥ ३७॥ गुडमें मिला भक्षण करे, पीछे गरम पानी पीवे । यह जुलाव सब प्रकारके गुल्मोंमें सुख करनेवाला है ॥ ३८ ॥ अथ क्षारपान । शुक्तिक्षारनिशाविशालकदली स्यात्सूरणं कोकिला पालाशं दह- नार्जुनं शटिजयापामार्गकूष्माण्डकम् ॥ दग्ध्वा क्षारविपाचितं परिस्रुतं हिङ्गु त्रिकद्वान्वितं गुल्मानाहविबंधशूलहरणं सर्वोद- राणां हितम् ॥ ३९ ॥ सींप, जवाखार, हलदी, इन्द्रायण, केला, जमीकन्द, कोलिस्ता, टेसू, चीता, अर्जुनवृक्ष, कचूर, अरणी, ऊंगा, कोहला इनको जला फिर पानीमें घोलके खार जमाके उस खारमें हींग, सोंठ, मिर्च, पीपल ये मिला खानेसे गुल्म, अफारा, मलका बन्धा, शूल इनका नाश होता है और सब प्रकारके उदररोगोंमें हित है ॥ ३९ ॥ अथ अजमोदादि औषध । अजमोदा शटी दन्ती विडंगं कुष्ठतुम्बुरु॥त्रिफला चित्रकं चैव शुण्ठी कर्कटशृङ्गिका ॥ ४० ॥ त्रिवृता च सुराह्वा च पुष्करं वृद्धदारुकम्॥तथाम्लवेतसं चैव तिन्तिडीकञ्च चिञ्चिनी॥४१॥ समं तु मातुलुङ्गेन विभाव्यमेकतः कृतम्॥ त्रिभागहिङ्गुसंयुक्तं घृतेन चूर्णितं हितम् ॥ निहन्ति वातगुल्मञ्च सशूलमुदरं तथा ॥ ४२ ॥ अजमोद, कचूर, जमालघोटाकी जड, वायविडंग, कूठ, धनियां, त्रिफला, सोंठ, काकडा- सींगी ॥ ४० ॥ निशोत, देवदार, पोहकरमूल, भिदारा, अम्लवेत, अमली इनको ॥ ४१ ॥ समानभाग ले एक बार विजौराके रसमें भावना दे, तीन भाग हींग मिला फिर घृतके संग इस चूर्णको खावे । यह वातके गुल्मको तथा शूलसहित उदररोगको नाशता है ॥ ४२ ॥ अथ हिंग्वादिचूर्ण । हिंगुफलत्रिकजीरकयुग्मं चित्रकभाङ्गीं कुष्ठविडंगम् ॥ तुम्बुरु- पुष्करविश्वसुराह्वं क्षारयुतं लवणानि च पञ्च ॥ ४३॥ वाति- कगुल्मविनाशनहेतोः शूलरुजश्च निहन्ति नराणाम् ॥ ४४ ॥