हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९७ ) और गोखरूके बीज, सोनामाखी इन्होंके चूर्णको भैंसके दूधके संग पीनेसे पथरी गिरती है ॥ १३ ॥ अथ अन्य उपाय। शस्त्रविधिरुत्तरीय सूत्रस्थाने प्रोक्तं घृताध्याये च स्मृतम्॥१४ पुराणषष्टिका शालिरक्ततण्डुलकास्तथा ॥ श्यामाकः कोद्रवो दालो मर्कटी तृणधान्यकम् ॥१५॥ यवगोधूमकुलत्थास्तथा चैवाढकी भिषक्॥वातहराः प्रयोक्तव्या भोजने वातरोगिणाम् ॥१६॥॥क्रौञ्चाद्यानि च मांसानि पथ्यान्यश्मरीनाशने ॥१७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सा- नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ उत्तर सूत्रस्थानमें शस्त्रविधि कहदी है, तैलाध्यायमें तैल कह दिया है और घृता- ध्यायमें घृत कह दिया है ॥ १४ ॥ पुराने सांठी चावल, शालिसंज्ञक चावल, लाल चावल, शामक, कोदूधान्य, दाल, क्रौंच, तृणधान्य आदि अन्न ॥ १५ ॥ जब, गेहूं, कुलथी, आढकी धान्य, इन भोजनोंको देवे और वातरोगवाले पुरुषोंको वातनाशक भोजनोंको देवे ॥ ॥ १६ ॥ पथरी रोगके नाशके वास्ते क्रूंजि आदि पक्षियोंका मांस देना चाहिये ॥ १७ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सानामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२. अथ वृषणचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अत ऊर्ध्वमण्डवृद्धिर्हृश्यते भिषजां वर ॥ बाल्ये मातुः पितुर्दोषाज्जायते वृषणानुगा॥१॥दुष्टादाराविहा- राच्च वातो बस्तिगतो भृशम् ॥ अण्डस्थानं च संप्राप्य तस्य वृद्धिं करोति वै॥२॥एकैकसन्निपातश्च चतुर्थः सन्निपातिकः ॥ पित्तदोषात्सन्निपातात्तथाऽसाध्या इमे स्मृताः ॥ ३ ॥ आत्रेय कहते हैं-हे उत्तमवैद्य ! हारीत ! इसके उपरांत अंडवृद्धि रोग होता है