भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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( ३९८ ) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने

सो बालकके मातापिताके दोषसे वृषणोंका रोग होता है ॥ १ ॥ दूषित स्त्रीके संग मैथुन करनेसे वस्तिस्थानमें प्राप्त हुआ बहुतसा वायु अंडस्थानमें प्राप्त होके अंडवृद्धि करदेता है॥२॥ एक एक दोषसे तीन प्रकारका और चौथा सन्निपातसे होता है और पित्तके दोषसे उपजे हुए और सन्निपातसे उपजे हुए अंडवृद्धिरोग असाध्य कहे हैं ॥ ३ ॥ दोषान् वक्ष्याम्यौषधानि शृणु तानि भिषग्वर॥स्वेदनान्यभ्य- ञ्जनानि क्वाथ्यपानं विधीयते ॥ ४ ॥ शिरःस्रावो भिषक्श्रेष्ठ तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ कंपश्च मृदुवातेन पित्तेन दाहकृ- ज्वरः ॥ ५ ॥ कफाद्दृढश्च शोषश्च कठिनो वृषणो भवेत् ॥ रसालशल्लकीक्वाथस्तर्कारी कटुतुम्बिका ॥ ६ ॥ क्वाथसं- सेवनार्था च मुष्कवृद्धिः सवातिके ॥ शीततोयावगाहो वा शीतसंसेवनं तथा॥शीतशीतैश्च लेपश्च पित्तमुष्के प्रशस्यते॥७॥ हे उत्तमवैद्य ! अब दोषोंको और औषधोंको कहते हैं सुनो । पसीना दिलाना, मालिस करनी और क्वाथ पान, नसोंका स्राव ये विधि करनी चाहिये ॥ ४ ॥ अब इनके लक्ष- णोंको कहेंगे, वातदोषसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें कंपनाहो कोमलहो और पित्तसे दाहहो, ज्वरहो ॥ ५ ॥ कफसे कड़ाहो, शोषहो, कठिन अंड हो, वातसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें आंब, शल्लकी वृक्ष, अरणी, कडुई तुंबी, इनका क्वाथ बना सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥ और पित्तसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें शीतल जलमें गोता मारना, शीतल वस्तुसे बना और चंदन, कपूर चीता इनका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ वृषणवृद्धिपर चिकित्सा । वचालवणतोयेन कदम्बार्जुनसर्षपैः॥कषायसेवनैः प्रोक्तं कफ- मुष्केऽहितापहम् ॥ ८ ॥ अरुणवरुणकोलं च शालिपर्णी शता- वरी॥क्वाथः पित्तसन्निपातमुष्कवृद्धौ विदां वर ॥ ९ ॥ वरुण- वृक्षादनी चैव दशमूली शतावरी॥क्वाथपानं वातिके च मुष्क- वृद्धौ हितावहम् ॥१०॥ एतेन भवते सौख्यं तदा कर्मावकार- येत्॥कर्णकोषस्य मध्ये तु रक्तान्निर्हारयेच्छिराम् ॥ ११ ॥ वामकोष्ठस्य वृद्ध्या तु दक्षिणां हारयेच्छिराम्॥उभाभ्यां द्वे शिरे वेध्ये तेन वा तत्सुखं भवेत् ॥१२॥ इति चाण्डक्रिया प्रोक्ता