भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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( ४१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

त्रापाः ॥ शैत्यं कफेन परुषत्वमनेकयोगात्सा सन्निपातवि- हिता च समस्तलिङ्गैः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे उत्तमवैद्य ! इस प्रकारके संक्षेपमात्रसे व्रणकी चिकित्सा कहदी है इसके यथार्थ उपचारको जानकेअच्छी तरहसे चिकित्सा करनी चाहिये॥ १॥दूषित जलके पीने से और कुत्सित अन्नके सेवनेसे क्रिमिरोगसे उपजीहुई गंडमाला जाननी।वात पित्त कफ इन दोषोंसे उपजेहुए इस विकारमें क्रिमियोंसे उपजाहुआ दोष गंड अर्थात् कपोल स्थानसे चलता है॥ २ ॥ वातसे उपजे हुए इसरोगमें वातके समान लक्षण होते हैं और पित्तसे उपजेमें दाह,पीड़ा,व्रण, शोष, ताप, ये होते हैं और कफसे उपजेमें शीतलता, कठोरता ये उपचार होते हैं और जिसमें सब लक्षण मिलते हों वह सन्निपातसे उपजा जानना ॥ ३ ॥ अथ लूता गंडमाला चिकित्सा । तस्य चेमं प्रतीकारं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ रोहिणी विशदा चैव विजया च विभेदिनी ॥ ४ ॥ कान्तारि वज्रपुष्पा च तथा चेंद्रायुधापरा॥इति सप्तविधा लूताः शृणु पश्चात्पृथक्पृथक्॥५॥ रक्तमुण्डा भवेद्रक्ता रक्तस्थाने च रोहिणी ॥ विशदा मांसलस्थाने श्वेतवर्णा च दीर्घिका ॥ ६ ॥ विजया च शिरोमध्ये पीतवर्णा यवप्रभा ॥७॥ भेदिनी मेदसंस्थाने श्वेता च नीलरखिका ॥ ८ ॥ कान्तारि बस्तिमध्ये च श्वेताङ्गा रक्तमुण्डिका ॥ वज्रपुष्पा चास्थिमध्ये श्वता कृष्णा शिरा मता ॥९॥ इंद्रायुधा शिरान्ते च धूम्रा कृष्णा शिरा मता ॥१०॥ रोहिण्यङ्गुलिमाश्रेण मूत्रेण विशदा समा॥विजया च यवाकारा वर्त्तुला विजया तथा॥११॥ अन्या नृणां च विज्ञेया तण्डुलीकण्टकानिभा ॥ रोहिणी विजया विंशा मांसस्थाने समाश्रिता ॥ १२॥ गुल्फे वा चास्थिसन्धौ च दृश्यते भेदिनी नरे ॥ कुक्षौ कर्णान्तरेऽपाङ्गे कान्तारि विद्धि पुत्रक ॥ १३ ॥ वज्रपुष्पा शिरसि च शिरान्ते चेन्द्रायुधा मता॥ अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु पुत्र प्रयत्नतः ॥१४ ॥ सान्द्रपूय- विस्रावञ्च गम्भीरञ्च व्रणं विदुः॥अन्यं च सरुजं चैव पक्वजम्बू- समप्रभम् ॥१५॥ लूताव्रणानां चैतानि अपक्वं यावद्दश्यते ॥