हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३९] भाषाटीकासमेता । (४१३) कुष्ठोंके सामान्यभेद और लक्षण । कुष्ठानि चाष्टादशधा वदन्ति तेषां पृथक्त्वेन वदामि चिह्नम् ॥ असाध्यसाध्यानि च कर्मजानि दोषोद्भवानि सहजानि तानि ॥३॥कारुण्यपारुष्यमथैव कण्डू रोमप्रहर्षःस्तिमितं तथैषाम्॥ तोदस्तथा संव्यथनं च देहे त्वचि स्थिते कुष्ठभवस्य चिह्नम्॥४॥ कुष्ठोंको अठारहप्रकारके कहते हैं वहां कर्मसे उपजे कुछ साध्य हैं और वातआदि दोषों- से तथा स्वभावसे उपजे असाध्य हैं ॥ ३ ॥ दीनता, कठोरपना, खाज, रोमहर्ष, नीलापन, शरीरमें चुभनेकीसी पीड़ा ये लक्षण कुष्ठकी आदिमें होते हैं ॥ ४ ॥ अथ कुष्ठोंके नाम । कपालकं चैवमुदुम्बरञ्च तथैव दद्रूणि च मण्डलानि॥ विसर्पकं हस्तिबलं किणञ्च गोजिह्वकं लोहितमण्डला वा॥५॥वैपादिकं चर्मदलं तथान्यं विस्फोटकान्यथ बहुव्रणञ्च ॥ कण्डूर्विचर्ची कथितं तथान्यद्धातुमभेदांस्त्वचि रोगसिद्धाः ॥ ६ कपालकुष्ठ, उदुम्बरकुष्ठ, दुद्रुमण्डल कुष्ठ, विसर्पकुष्ठ, हस्तिवलकुष्ठ, किणकुष्ठ, गोजिह्वक कुष्ठ, लोहितमंडला॥ ५ ॥ वैपादिक, चर्मदल, विस्फोटका, बहुव्रण, कंडु, विचर्चिका ऐसे इसप्रकारसे धातुओंके भेदसे उपजे हुए रोग त्वचा में प्रतीत होते हैं ॥ ६ ॥ कपाल व उडुंबरकुष्ठलक्षण । कपालकाभं सितवर्णकञ्च कपाल्यकं तद्वदितं विधिज्ञैः ॥ स्निग्धञ्च सर्वाङ्गगतं च कण्डूमदुम्बरं तं प्रवदन्ति सन्तः॥ ७ ॥ कपालसरीखा सफेद वर्णवाला हो वह वैद्यजनोंने कपालककुष्ठ कहा है और चिकना हो सब अंगमें प्राप्त हो, खाजी हो वह उदुंबरकुष्ठ कहाता है ॥ ७ ॥ अथ मंडलकुष्ठ तथा गजचर्मकुष्ठका लक्षण । दद्रूपमं यद्भवते च दद्रूर्दद्रूपमं मण्डलकं तमाहुः ॥ विसर्पकं सर्पति तद्विसर्पे तथान्यमान्त्रं गजचर्मतुल्यम्॥८॥ जो दादके समान हो दादसरीखे मंडल हो वह दद्रुमंडल कुष्ठ कहाता है और जो विसर्परोगकी तरह शरीरमें फैले उसको विसर्पकुष्ठ कहते हैं, जिसकी हस्ती सरीखी त्वचा होजावे उसको गज- चर्मककुष्ठ कहते हैं ॥ ३८ ॥