हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आश्रय रहती है ॥ १२ ॥ टांकनेकी गुल्फ अस्थि संधि इनमें विमेदिनी लूत होती है और कोखो कानके समीपस्थान, नेत्रोंके समीप यह कांतारीनामक लूत होती है ॥ १३ ॥ वज्रपुष्पा शिरमें होती है और नसोंके मध्यमें इंद्रायुधा लूत होती है हे पुत्र ! अब इनकी औषध कहते हैं यत्नसे सुनो ॥ १४ ॥ कड़ीराध झिरती हो तहां गंभीर व्रण कहते हैं और अन्य पीडा स- हित और पकेहुए जामनके फलके समान व्रण होता है ॥ १५ ॥ लूतके व्रण जबतक पके नहीं उससे पहले मर्मसंधियोंको त्यागके लूतको और व्रणको गरम २ तैलसे दग्ध करना चाहि- ये ॥ १६ ॥ अंकोल मदिरा, नींवके पत्ते, घरका धूम, कालाजीरा इनको गोमूत्रमें पीस लेप करनेसे लूतका नाश होता है ॥ १७ ॥ तगर, वायविडंग, इंगुदीवृक्षकी जड़, बिजोराकी जड़ इनको पीस लेप करनेसे घोर गंडमाला कंटकरोग इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ १८ ॥ और थोहरका दूध, आकका दूध, इनको लूतके छिद्रोंमें युक्त करनेसे उसके मध्यके कीडे मरजाते हैं, ॥ १९ ॥ सफेद गोकर्णी, चंदन, इनको समान भाग ले पीसके लेप करनेसे दारुण लूतका नाश होता है ॥ २० ॥ कनेर, आकका दूध, कडुई तुंबी, दोनों हल्दी कपूर, कचरी, इनको तिलोंके तैलमें पका ॥ २१ ॥ मालिस करनेसे लूत, गंडमाला, इनका नाश होता है और जात्यादिक नामवाला घृत यहां युक्त करना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ और अन्य जो व्रणमें कहीहुई औषध हैं वे यहां करनी श्रेष्ठ हैं ॥ २३ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थानेलूतगंडमालाचिकित्सानानाम अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३९. अथ कुष्ठचिकित्सा । आत्रेयउवाच॥ विरुद्धपानानि गुरूणि चाम्लपापोदक सेवन- केन वापि ॥निद्रा दिवासुप्रतिजागराच्चपित्तं प्रकुप्येद्रुधिराश्रितं तत् ॥ १॥ त्वचागतः सर्पति रोगदोषः कुष्ठेति संज्ञां प्रवदन्ति धीराः ॥ पापोद्भवास्ते प्रभवन्ति देहे नृणां भृशं कोपयतां विधिज्ञा ॥ २॥ आत्रेयजी कहते हैं-विरुद्धपान और गरिष्ठ भोजन, खट्टे तथा दूषित जलके सेवनेसे, दिनमें सोने और रातमें जागरण करनेसे रक्तके आश्रय हुआ पित्त कुपित होता है ॥ १ ॥ त्वचामें प्राप्त हुआ रोगरूपदोष फैलता है,तब कुष्ठ ऐसी संज्ञा होती है । पापसे उत्पन्न होनेवाले वे रोग मनुष्योंके शरीरमें कोपसे प्राप्त होजाते हैं अब तिनके जुदे जुदे लक्षणोंको कहेंगे ॥२॥