हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३९] भाषाटीकासमेता । ( ४१७ ) हरडै इनके काथसे वातसे उपजा कुष्ठका नाश होता है, इक्कीस दिनतक यह महान् औषध पीना चाहिये ॥ २७ ॥ गुडूच्यादि क्वाथ । नित्यं छिन्नोद्भवाचूर्णं तस्याः क्वाथसमन्वितम् ॥ पीतं जीर्णे सघृ- तञ्च पीतञ्च षाष्टिकं पयः ॥ २८ ॥ हन्ति कुष्ठानि सर्वाणि सप्त- धातुगतानि च ॥ २९ ॥ गिलोयके क्वाथके संग गिलोयके चूर्णको नित्य पीवे । जर जावे तब घृत सहित सांठि चावलोंके मांडको पीवे ॥ २८ ॥ यह सातों धातुओंमें प्राप्त हुए सब कुष्ठोंको नाशता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठरोगमें लेपविधि । रसेन्द्रकाश्मर्यघनञ्च कुष्ठं निशाद्वयं काञ्जिककुष्ठमेतत् ॥ लेपे प्रशस्तं विनिहन्ति कुष्ठं विचर्चिकां चापि विसर्पदोषम् ॥३०॥ पिष्टानि तत्र मधुकाञ्जिकमूत्रपिष्टलेपेन कुष्ठमपि दुष्टविचर्चि- काञ्च ॥ ३१ ॥ विसर्पदोषे प्रोक्तानि धावनानि च कारयेत् ॥ सौवीरकरसेनापि धावनं त्रिफलाम्बुना ॥ ३२ ॥ वातिके चैव कुष्ठे च प्रशस्तं कथितं बुधैः॥ निम्बपत्रकषाये च यष्टीमधुक- कल्कितम् ॥ ३३ ॥ दुग्धेन शीतलेनापि विदार्याः क्वाथके- न वा ॥ हन्ति कुष्ठं महाघोरं धावनं न प्रशस्यते ॥३४॥ अग्नि- मन्थपटोलानि मातुलुङ्गदलानि च॥शटीपर्पटकःक्वाथो धावनं श्लेष्मरोगिणाम् ॥ ३५ ॥ विपादिकां नवनीतेन क्षालयित्वा विदांवर ॥ स्वेदयित्वार्कदुग्धैश्च मधुतैलेन लेपनम् ॥ ३६ ॥ खंभारी, सिंगरफ, नागरमोथा, कूठ, दोनों हलदी, कांजीमें शोधा हुआ लोहा, इनको पीस कुष्ठपै लेप करना श्रेष्ठ कहा है और विचर्चिका, विसर्पदोष, इनका नाश होता है ॥३०॥ सीसाकी रजको शहद, कांजी, गोमूत्र इनमें पीस लेप करनेसे कुष्ठ, दुष्ट विचर्चिका इनका नाश होता है ॥ ३१ ॥ विसर्प दोषमें कहेहुए धोवनेके कर्म यहां करने चाहिये और कांजी, त्रिफलाका रस इनसे धोना श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥ यह इलाज वैद्यजनोंने वातसे उपजे कुष्ठमें श्रेष्ठ कहा है और नींबके पत्तोंके काथमें मुलहटीका कल्क बना ॥ ३३ ॥ शीतल दूधमें मिला अथवा विदा- रीकंदके काथमें मिला उससे धोवनेसे महाघोर कुष्ठका नाश होता है ॥ ३४ ॥ अरणी, पर- २७