भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 450

( ४१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बल, बिजौराके पत्ते, कचूर, पित्तपापडा इनका काथ बना कफसे उपजें कुष्ठको धोना श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ विपादिका कुष्ठको नौनी घृतसे संयुक्त कर तहां आकके दूधसे पसीना दिया शहद और तैलका लेप करे ॥ ३६ ॥ अथ खदिरआदि क्वाथ । खदिरनिम्बकदम्बकमर्जुनमथ च पाटलिका च शिरीषकम् ॥ कुटजकिंशुकवासुसमोरटो वटकुटं नटपिप्पलिपीलुकम् ॥३७॥ धवमुदुम्बरवेतसमेकतः कथितपानविधानघृतेन तु ॥ सकल- कुष्ठविनाशनकारकं भवति चेन्दुसमानवपुर्नरः ॥ ३८ ॥ खैर, नींव, कदंब, अर्जुनवृक्ष, पाडलवृक्ष, शिरस, कूडाकी छाल, टेशू, वांसा, मोर अर्थात् खैरका भेद, वड, टेंटूवृक्ष, पीलूवृक्ष ॥ ३७ ॥ धव, गूलर, वैत, इनको एक जग- हकर काथ बना घृत मिला पीनेसे संपूर्ण कुष्ठोंका नाश होता है और चंद्रमाके समान सुन्दर शरीर होजाता है ॥ ३८ ॥ अथ आरग्वधआदिक्वाथ । आरग्वधाधातकिर्काणकारधवार्जुनैः सज्जककिंशुकानाम् ॥ कदम्बनिम्बाकुटजाटरूषा मूर्वा च युक्ता खदिरेण चैषा ॥ ॥३९॥मूलानि चैषामुपहृत्य सम्यगष्टावशेषे कथितः कषायः॥ घृतेन तुल्यं प्रतिमानवस्य निहन्ति सर्वाणि शरीरजानि ॥ ॥ ४० ॥ कुष्ठानि सर्वाणि विसर्पदद्रुविचर्चिका हन्ति नरस्य शीघ्रम् ॥ ४१ ॥ अमलतास, धाय, कनेर, धववृक्ष, अर्जुनवृक्ष, रालवृक्ष, टेशू, कदंब, नींव, कूडाकी छाल, वांसा, खैर, मूर्वा ॥ ३९ ॥ इनकी जडको ले काथ बना लेवे पीछे अष्टमांश बाकी रहे तब उतार उसमें समान भाग घृत मिला खानेसे मनुष्यके शरीरके सब प्रकारके कुष्ठोंका नाश होता है ॥ ४० ॥ सबप्रकारके कुष्ठ, विसर्परोग, दाद, विचर्चिका इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४१ ॥ अथ खदिरादिघृतपानक । खदिरकदरमूर्वावालकं कर्णिकारः कुटजसपरिभद्रारग्वधाभिश्च पिष्टाः॥कथितमिति समांशं पीतमाज्येन युक्तं जयति सकल- कुष्ठान् वै विसर्पस्य दोषान् ॥ ४२ ॥