हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 451, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३९ ] भाषाटीकासमेता । (४१९) खैर, सफेद खैर, मूर्वा, नेत्रवाला, वडा अमलतास, कुडाकी छाल, नींव, अमलतासको पीस इन्हींके समान घृत मिला काथ बना पीनेसे संपूर्ण कुष्ठरोग विसर्पदोष इनका नाश होता है॥४२॥ अथ भल्लातक तैल । भल्लातकत्र्यूषणमक्षचूर्णं कुष्ठञ्च गुञ्जालवणानि पञ्च ॥ फलत्रिकं तैलविपाचितानि चाभ्यञ्जनं हन्ति च दद्रुकुष्ठम् ॥४३ ॥ भिलावा, त्र्यूषण अर्थात् सोंठ, मिर्च, पीपल, बहेडा, कूठ, घोंवचिल, पांचों नमक, त्रिफला इनको समान भाग ले चूर्ण बना तेलमें पकावे पीछे इस तेलकी मालिस करनेसे दद्रुकुष्ठका नाश होता है ॥ ४३ ॥ अथ तिलतैल । अश्वघ्नमूलं मलिनं समङ्गा निशाद्वयं सर्षपचित्रकञ्च ॥ सभृङ्ग- राजं कटुतुम्बिका च कुष्ठं विडङ्गं मगधा च चूर्णम् ॥४४॥ स्नु- ह्यर्कदुग्धेन विपाचितं तु तैलं तिलानां परिपक्वमेतत् ॥ अभ्यञ्जनं चैव नरस्य नूनं दद्रूणि कण्डूनि विनाशयेच्च ॥ ४५ ॥ कनेरकी जड, अगर, मंजीठ, दोनों हलदी, सरसों, चीता, भंगरा, कुटकी, तुंबी, कूठ, वायविडंग, पीपली ॥ ४४ ॥ इनको थोहरके और आकके दूधमें पका पीछे इसमें तिलोंके तेलको पकावे इसकी मालिस करनेसे मनुष्यके दद्रुकुष्ठोंका नाश शीघ्र ही होता है ॥ ४५ ॥ अथ हरिद्रादि तैल । हरिद्रा समङ्गा सुराह्वं सचित्राविडङ्गानि कृष्णा विशालाम्बु कुष्ठम् ॥ तथा लाङ्गली चक्रमर्दं च गुञ्जा विशाला तथारिष्ट- पत्राणि चैतत् ॥४६॥ सुचूर्णीकृतं भावितं वै तथैतद्गुडैनैव सर्वं हि घर्मे विपाच्यम् ॥ हितं लेपने कुष्ठपामाविचर्चीर्नरस्याति शीघ्रं निहन्तीति शल्यम् ॥ ४७ ॥ हलदी, मंजीठ, देवदार, चीता, वायविडंग, पीपली, इंद्रायण, नेत्रवाला, कूठ, कलहारी, चकौंडी, घोंवचिल, इंद्रायण, नींवके पत्ते ॥ ४६ ॥ इनको समान भाग ले चूर्ण बना गुड़के रसमें भावना दें । घाममें धरके पका लेप करना हित है । कुष्ठ, पामा, विचर्चिका इन रोगोंका शीघ्र ही नाश होता है ॥ ४७ ॥ अथ निंबादिघृत । निम्बं पटोलं च किरातकञ्च जाती विशाला सपुनर्नवा च ॥