हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४०.] भाषाटीकासमेता । ( ४२३ ) आत्रेयजी कहते हैं—अतिभारके अत्यन्त योगसे अतितीक्ष्ण भावसे तैलादिकी मालिस करे बिना शीतलता लगनेसे अत्यंत पित्तसे ॥ १ ॥ अथवा क्रिमि दोषसे पुरुषोंके शिरो- रोग होता है और वातरक्त, कफपित्त, पित्त ॥ २ ॥ अथवा सन्निपात, इनसे उत्पन्न होने- वाले शिरोरोग क्रिमिन शिरोरोग ऐसे होते हैं, और अधशिरका विकार तथा दिनके चढ़नेके समय शिरोरोग होता है ॥ ३ ॥ वातदोषसे उपजे शिरोरोगमें रात्रिमें पीडा हो, और पीड़ित हुएका शिर दुखे और पसीना दिलाने तथा मर्दन करनेसे सुख होवे । विष्ठा उतरनेके समय अथवा वृषणस्थानमें दुःखहो वह वातसे उपजी पीडा जाननी ॥ ४ ॥ जिसका शिर गर्म रहे और घामसे संतापमें दिनमें अथवा रात्रिमें धुवांसे शिरमें पीड़ाहो, कडू कफ भिरे वह पित्तसे उपजा शिरोरोग जानना जिसमें रात्रिमें सुख होता है ॥ ५ ॥ और शीतलतासे सुख हो, तृषा लगे, तीव्र पीड़ाहो, वह पित्तसे उपजी पीडा जाननी और जो सूर्योदयमें अथवा दिनके अंतमें शमहो तृणाहो पीड़ाहो ॥६॥ शिरमें जड़ताहो शीतलहो पसीनेसे युक्त दोनों नेत्रहों और सुंदर नेत्रहों वह कफसे उपजा शिरोविकार जानना ॥ ७ ॥ और रक्तसे उपजे शिरके विकारसे नासिकासे रक्त झिरे, मुखमें तृषा रहे, और जिसके कंघा, कंघाके समीप मन्यास्थान, पैर, ये लाल हों उसको कफसे उपजा शिरोरोग कहते हैं ॥ ८ ॥ मध्यमें दूषित हो, पीली नासिका होजावे, दुर्गंधि सहित जल झिरे, जड़ता हो, मोहहो, श्वासहो वह त्रिदोषसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ ९ ॥ जिसके शिरमें अत्यंत व्यथा हो और मस्तक फटाजावे नासिकासे रक्त और राध झिरे वह क्रिमियोंसे उपजी शिरकी पीड़ा जाननी ॥ १० ॥ और क्रोध, शोक, कसरत, अत्यंत परिश्रम इनसे उपजी हुई पीड़ा वातके कोपसे होती है वहां व्यथा होती है ॥ ११ ॥ अत्यंत लिखना, पढ़ना, सूक्ष्म देखना, दूरसे दृष्टिदेके देखना इनसे उपजी पीडा वात रक्तके कोपसे जाननी ॥ १२ ॥ उसकी आधी नासिकामें और दोनों भुकुटियोंके आधे भागमें पीडा हो, नीला और काला वर्ण सरीखा दीखे, मस्त- कमें पीड़ाहो ॥ १३ ॥ रक्तके बिना पित्त नहीं होती है और रक्त, पित्तसे चलायमान होता है और पित्तसे विना शिरमें पीडा नहीं होती है, पित्त वातसे चलायामान होता है ॥१४॥ तस्माद्वक्ष्याम्युपचारं शृणु भेषजलक्षणम् ॥ स्वेदः प्रलेपनं नस्यं पानाभ्यङ्गश्च मर्दनम् ॥ १५ ॥ स्वेदनं वातकफजे चाभिघाते तथा पुनः॥ पित्तजे रक्तजे वापि न कुर्यात्स्वेदनं तयोः॥१६॥ रक्तजे च शिरा वेध्या पित्तजे वापि कुत्रचित्॥ कोकिलाख्या च तर्कारि कटुका निम्बपत्रकैः ॥ १७ ॥ शोभाञ्जनकपत्रैस्तु क्वाथं वा तेन स्वेदयेत् ॥ अमीषाञ्च प्रलेपेन सौख्यं चास्य प्रजायते ॥१८॥ संशीतपरिषेकैश्च यष्टीमधुकचन्दनैः ॥ केसरै-