हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४२४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मातुलुङ्गैश्च पित्तजे शीतलेपनम् ॥ १९ ॥ कदम्बार्जुनसिन्धूश्च लेपनार्थे भिषग्वर ॥ गुडेन नागरा वापि पथ्यां वापि गुडेन वा ॥२०॥ गुडशोभाञ्जनरसैर्नस्ययोगात्पृथक्पृथक् ॥ नस्येन बस्तमूत्रेण शिरोऽर्त्तिश्चोपशाम्यति ॥२१॥ मरिचं पथ्या कट्- फलं मूत्रेणोष्णोदकेन वा ॥ नस्यं कफोद्भवे घोरे शिरोरोगे भिषग्वर ॥२२॥ वचामधुकसारं वा मूलं वा गिरिकर्णिका ॥ नस्यप्रयोगे विहितं सन्निपाते शिरोगदे ॥ २३ ॥ वन्ध्याकर्कोट- कीमूलं पिष्टमूष्णेन वारिणा ॥ मितं नस्ये प्रयुञ्जीत क्रिमिजे च शिरोगदे ॥ २४ ॥ इसवास्ते इसके उपचारको कहते हैं औषधोंको सुनो-पसीना दिवाना, लेप करना, नस्य दिवानी, पान कराना, मालिस मर्दन कराना ॥ १५ ॥ वात कफसे उपजे तथा चोट आदिसे उपजे शिरोरोगमें पसीना दिवावे और पित्तसे तथा रक्तसे उपजेमें पसीना नहीं दिवावे ॥ १६ ॥ रक्तसे उपजे शिरोरोगमें फस्त खुलावे और कहींक पित्तसे उपजेमेंभी शिरावेध श्रेष्ठ है और कंकोल, अरणी, कुटकी, नींवके पत्ते ॥ १७ ॥ सहिजनके पत्तेका काथ बना उससे पसीना दिवावे अथवा इनके लेप करनेसे सुख होता है ॥ १८ ॥ पित्तके शिरोरोगमें मुलहटी, महुआवृक्ष, चंदन, इनके शीतल काथसे परिषेक करे और बिजौरेकी केशरसे शीतल २ लेप करे ॥ १९ ॥ और हे उत्तमवैद्य ! कदंब, अर्जुनवृक्ष, सेंधानमक, इनका लेप करना श्रेष्ठ है और गुडके संग सोंठ, तथा हरडैका लेप श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ और गुड़ सहिज- नेका रस इनकी पृथक् २ नस्य देनी श्रेष्ठ है और बकरेके मूत्रकी नस्य देनेसे शिरकी पीडाका नाश होता है ॥ २१ ॥ और कफसे उपजे घोर शिरोरोगमें मिर्च, हरड़ै, कायफल, इनको पीस गरम २ गोमूत्रके संग नस्य देना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ वच, महुआ, मूली, अमलतास, इनको नस्यमें देनेसे सन्निपातसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २३ ॥ बांझ कक्रोडीकी जडको पीस गरम जलके संग नस्य देनेसे कृमिसे उपजा शिरोरोग नाश होता है ॥ २४ ॥ अथ षड्बिन्दुनामकतैल । भृङ्गराजरसं चैकं द्विभागं काञ्जिकेन च ॥ शोभाञ्जनं भागत्रयं सर्वं तत्र विनिक्षिपेत् ॥२५॥ सौवीरकरसं पञ्च षड्भागं तुम्बि- कारसम्॥ शुण्ठी सैन्धवमम्लीका पटोलं वासकं शिवा॥२६॥ अभया सुरसा चैव तैलञ्च चतुरंशकम् ॥ पाचितं तन्तु नस्येन