भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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०अ० ४० ] भाषाटीकासमेता । ( ४२५ ) योजयेच्च षड्बिन्दुकम्॥२७॥ तथैव मस्तकाभ्यङ्गे हितं स्यात् कर्णपूरके॥हितं वातादिजे रोगे शिरोऽत्तौं क्रिमिजे तथा ॥२८॥ भांगरेका रस एक भाग, कांजीदो भाग, हिंसजना ३ भाग॥२५॥बेरोंका रस पांच भाग तुम्बीका रस ६ भाग इनको एक जगह मिला सोंठ, सेंधानमक, अमली, परवल, वांसा, हलदी ॥२६॥ हरडै, तुलसी इनको मिला पीछे इन सब रसोंसे चतुर्थांश तैल मिला उसको पकाके उस तैलकी छह बूंद नस्यमें देनेसे ॥ २७ ॥ तथा मस्तकपर लेप करनेसे अथवा कानमें पूरनेसे वातादिक शिरोरोग तथा क्रिमियोंसे उपजा शिरके रोगका नाश होता है ॥ २८ ॥ अथ बिन्दुत्रयतैल । करञ्जबीजस्य विभीतकानां पुटेन तैलं परिस्रुत्य धीमन् ॥ बिन्दुत्रयं नस्यविधौ प्रयोज्यं जघान कुष्ठं क्रिमिजं विकारम्॥२९ करंजुवाके बीज, बहेड़ा, इनको पुटपाकमें धर तैल निकास उसकी तीन बूँद नस्यमें देवे यह तैल कुष्ठ, क्रिमिसे उपजा विकार इनका नाश करता है ॥ २९ ॥ अथ कुष्ठादिघृत । कुष्ठं च यष्टीमधुकं च नीत्वा पटोलजातीसुरसारसञ्च॥ विपा- चितं तन्नवनीतकञ्च घृतेन नूनं च सरक्तपित्ते ॥३०॥ सशर्क- रायुक्तमिदं दिवा च गव्यं प्रवृद्धप्रभवे च दोषे ॥ ३१ ॥ कूंठ, मुलहटी, परवल, जावित्री, तुलसी रस, नौनी घृत इन्होंको पकालेये पीछे इस घृतकी नस्य रक्तपित्तसे उपजें शिरके रोगमें देवे ॥३०॥ और दिनके बढ़नेके समय जो दर्द बढ़ाता है ऐसे रोगमें इस घृतमें खांड मिलाके नस्य देना हित है ॥ ३१ ॥ अथ लाक्षादितैल । लाक्षारसं चन्दनयष्टिकानां पटोलधात्रीफलशर्कराणाम् ॥दधि सदुग्धं नवनीतकञ्च विपाचिते नस्यविधौ प्रयुज्यते ॥ ३२ ॥ भ्रूदोषशङ्खक्षतजक्षये वा दिनादिवृद्धया प्रभवेऽपि दोषे ॥३३॥ लाखका रस, चंदन, मुलहटी, परवल, आंवला, खांड, दही, दूध, नौनीघृत इनको पका नस्य देनेसे ॥३२॥ भ्रूदोष कनपटीस्थानका दर्द चोटसे तथा क्षयरोगसे उपजा तथा दिनवृद्धिके अनु- सार शिरोरोग इनका नाश होता है ॥ ३३ ॥ अथ कुंकुमादिघृत । कुङ्कुमं यष्टिमधुकं कुष्ठं च शर्करासमम्॥पक्वञ्च नवनीतेन घृतं