भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

( ४२६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- नस्ये प्रयोजयेत् ॥३४॥ नश्यन्ति पित्तजा रोगा दिनवृद्धयो- पवर्जनात् ॥ अर्द्धशीर्षविकारश्च प्रशमं याति सत्वरम् ॥३५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सा नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ केशर, मुलहटी, कूट, खांड, नौनीघृत इनको समान भाग ले पकाके नस्य देनेसे ॥ ३४ ॥ पित्तसे उपजे तथा दिनवृद्धि, शिरोरोग, अधसिरा इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥३५॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शिरोरोगचिकित्सानाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ एकचत्वारिंशोऽध्यायः ४१. अथ भ्रूदोषलक्षण । आत्रेय उवाच॥अतिपठनशीलस्य सूक्ष्मवस्त्रेक्षणेन वा॥दूरालो- केन चोष्णेन भ्रूदोषश्चोपजायते ॥ १ ॥ रक्तवाताश्रितो दोषः पित्तेन सह मूर्च्छितः ॥ अन्यथा च प्रभवति नासावंशोद्भवा शिरा ॥ २ ॥ व्यथते चोष्णवेलासु शीतेन स्याद्विशेषतः ॥ नेत्रमध्ये नीलपीतमण्डलानि च पश्यति ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अत्यंत पढ़नेसे सूक्ष्म वस्त्र आदिके देखनेसे दूरसे देखनेसे गरम वस्तुके सेवनेसे भ्रूदोष रोग होजाता है ॥१॥ रक्त वातके आश्रयहुआ दोष पित्तके संग मूर्च्छित भ्रुकुटियोंमें पीड़ाकर देता है और नासिकाकी डंडीपर होनेवाली नस ॥ २ ॥ पीड़ित होती है गरमीके समय पीड़ा होती है और ठंडकमें ज्यादे पीड़ा होती है और नेत्रोंके मध्यमें नीले और पीले मंडल दीखे ॥ ३ ॥ भ्रूदोषकी चिकित्सा । तस्यादौ च क्रियां कुर्याच्छिरा वेध्या प्रयत्नतः॥पूर्वोक्तं स्वेदनं कार्य नस्ये षड्बिन्दुकादिकम् ॥ ४ ॥ देवदारु रजनी घनं शटी पुष्करं कुटजबीजमागधी ॥ कुष्ठरोध्रचविकायवासकं क्वाथितं च पुनरेव विस्रुतम् ॥ ५ ॥ तत्र गुग्गुलमपि क्षिपेत्पुनः