भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 459

शुण्ठिसैन्धवफलत्रिकं हितम् ॥ चूर्णितं दधिपयोविमिश्रितं पाचितं च नवनीतक च तत् ॥६॥सिद्धमेव विदधीत शीतलं शर्करायुतमिदं च नस्यदम्॥नस्यकर्म शिरसो रुजापहं भ्रूल- लाटभुजशंखमूलकम् ॥ ७ ॥ शर्षिरोगमपि चार्द्धशीर्षकं तो- दने च विहिते न केवलम् ॥ कर्णरोगमपि वारयत्यपितैलमाशु किल साधितं सुत ॥८॥ ताम्बूलपत्रस्य रसं विडङ्गं सिन्धूद्भवं हिङ्गुगुडेन युक्तम्॥जलेन पिष्टं विहितं च नस्यं भ्रूशंखदोषांश्च क्रिमीन्निहन्ति ॥९ ॥इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने भ्रूढोषचिकित्सानामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

इस रोगकी आदिमें यत्नसे सिरोवेध कर्म करे और पहले कहाहुआ पसीनेका कर्म करवावे और नस्यमें षड्बिंदुक आदि तैलको देवे ॥ ४ ॥ और देवदार, हलदी, नागर- मोथा, कचूर, पोहकरमूल, कूड़ाका बीज, पीपल, कूट, लोध, चव्य, जवासा इनका काथ बना उसको छान ॥ ५॥ पीछे उसमें गूगल, सूंठ, सेंधानमक, त्रिफला इनका चूर्ण मिला दही दूध ये मिला और नौनीघृत मिला ॥ ६ ॥ पीछे इसको पकावे । सिद्ध होजावे तब शीतल कर खांड़ मिला इसकी नस्य देनेसे शिरके रोगका नाश और भ्रुकुटि, मस्तक, भुजा, कनपटीका स्थान ॥ ७ ॥ शिरोरोग, अधशिरका रोग इन और सब रोगोंकी पीडाका नाश होता है और इसीप्रकारसे सिद्ध किये हुए तेलसे कानके रोगकी पीड़ा दूर होती है और शिरके रोग हर- नेमें अति श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥ नागर पानका रस, वायविडंग, सेंधानमक, हींग, गुड़ इनको जलमें पीस नस्य देनेसे भ्रुकुटी, कनपटी इनकी पीड़ा, क्रिमियोंसे उपजी शिरकी पीडा, इनका नाश होता है ॥ ९ ॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रदोष- चिकित्सानाम एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ४२. अथ नासारोग लक्षण । आत्रेय उवाच॥नासारोगो भवद्धीमन् क्रिमिजो दोषजः पुनः॥ रक्तजश्च भिषक्श्रेष्ठ लक्षणञ्च शृणुष्व मे ॥१॥ वाताच्छिरोऽर्त्तिः