हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४९] भाषाटीकासमेता । (४३३) आत्रेयजी कहते हैं-गरम, अतिखारा, चर्चरा ऐसे भोजनोंसे तथा अभिघातसे और सूक्ष्म वस्त्र देखनेसे नेत्रमें रहनेवाले दोष कुपित हो जाते हैं ॥ १ ॥ जो स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं वे कष्टसाध्य होते हैं । अब उनके लक्षणोंको सुनो । नेत्र रूखा हो, खाज हो, पीडा हो, शुष्क हो और शीतल रुधिर झिरे ॥ २ ॥ वह वातका नेत्ररोग जानना । अब पित्तके लक्षणोंको सुन ॥ ३ ॥ पित्तसे उपजे नेत्ररोगमें गरम २ जल गिरे और लाल तथा दाह सहित नेत्र हों,कफके नेत्ररोगमें शीतल और जडता हो, सन्निपातके नेत्ररोगमें शोजा और खाज होती है॥४॥दो दोषोंसे उपजे नेत्ररोगमें मिले हुए लक्षण होते हैं और सन्निपातके नेत्ररोगमें सब लक्षण मिलते हैं, ऐसे विलक्षण रोगको जानके उसकी चिकित्साको मुझसे सुनो ॥ ५ ॥ अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा । शुण्ठीसुराह्वसुरसाः सह काञ्जिकेन चोष्णेन धावनमिदं सह पै- त्तिकेच॥श्लेष्मोद्भवे त्रिफलकल्कमिदं समूत्रं शस्तं जनैश्च कथितं न विचिन्तनीयम् ॥ ६ ॥ शुण्ठी शटी च रजनी त्रिफला सनिम्बा पत्राणि सैन्धवयुतानि तुषाम्लकेन ॥ शस्तं वदन्ति नयनेषु स- सन्निपाते रक्तोद्भवे च सरुजे च तथा च शस्तम् ॥७॥ फलत्रिकं चारुनिशासु धूमो वचासु वर्षाभवसैन्धवेन ॥ प्रलेपनं श्लेष्मभवे विकारे सवातिके वा हितमेव शस्तम् ॥८॥ शुण्ठीसैन्धवतक्रेण ताम्रभाण्डे विघर्षितम् ॥ अपामार्गस्य मूलं वा मूलं धत्तूरकस्य वा ॥ ९ ॥ अञ्जनञ्च हितं तेषां वातनेत्रामयापहम् ॥१०॥ दुग्धो- त्पन्नं नवनीतं यष्टी निम्बस्तिलाश्च संयोज्याः ॥ त्रिफला गुडसं- युक्ता लेपनं कफनेत्ररोगघ्नम् ॥ ११ ॥ शुण्ठी सैन्धवतुत्थं मा- गधिका ताम्रभाजने घृष्टम् ॥ दध्ना घृतेनाञ्जनकं निहन्ति सर्वांश्च नेत्ररोगान्वै ॥ १२ ॥ वातपित्तकफदोषसम्भवान्नेत्रयोर्बहुव्यथां विनाशकः ॥ एक एव हरति प्रयोजितः शिग्रुपल्लवरसः स- माक्षिकः ॥ १३ ॥ सोंठ, देवदार, तुलसी इनको कांजीमें काथ बना गरम २ से पित्तके उपजे नेत्ररोगमें नेत्रोंका धोवना श्रेष्ठ है और कफसे उपजे नेत्ररोगमें त्रिफलाके कल्कको गोमूत्रमें पका धोवना श्रेष्ठ है ऐसे अन्य वैद्योंने भी कहा है ॥ ६ ॥ सोंठ, कचूर, हलदी, त्रिफला, नीमके पत्ते, सेंधानमक, इनको जवोंकी कांजीमें सिद्ध कर सन्निपातसे उपजे नेत्ररोग तथा रक्तसे उपजे हुए पीडासहित २८