भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

(४३४) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- रोगमें धोवना श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ त्रिफला, दारुहलदी, घरका धूंवा, वच, सांठी, सेंधानमक इनका लेपं करनेसे कफसे उपजा अथवा वातसे उपजा नेत्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥ सोंठ, सेंधानमक इनको तांबेके पात्रमें तक्रके संग घिस अंजन घाले अथवा ऊंगाकी जड तथा धतूरेकी जडको घिस ॥ ९ ॥ अंजन घालनेसे सब प्रकारके नेत्ररोगोंका नाश होता है ॥ १० ॥ दूधसे उत्पन्न हुआ नौनीघृत, मुलहटी, नींब, तिल, त्रिफला, गुड़, इन सबोंको मिला पीसि लेप करनेसे कफसे उपजा नेत्ररोग नाश होता है ॥ ११ ॥ सोंठ, सेंधानमक, नीलाथोता, पीपली इनको तांबाके पात्रमें घिस, दही और घृतके संग नेत्रमें आंजनेसे नेत्रके सब रोगोंका नाश होता है ॥ १२ ॥ वात, पित्त, कफ इन दोषोंसे उपजे हुए नेत्ररोगकी बहुतसी पीडाका नाश शीघ्रही होता है और एक सहिंजनेके पत्तोंके रसमें ही शहद मिला नेत्रोंमें आंजनेसे सब नेत्ररोग दूर होते हैं ॥ १३ ॥ अथ नेत्रके फूलेकी चिकित्सा । मिथ्याहारविहारैस्तु नेत्रे पुष्पञ्च जायते ॥ प्रथमं सुखसाध्यं स्याद्वितीयं कष्टसाध्यकम् ॥ १४ ॥ तृतीयं शस्त्रसाध्यं तु चतुर्थं तदसाध्यकम् ॥ १५॥ शङ्खपुष्पं तथा रोध्रं शङ्खनाभिर्मनःशिला॥ काञ्जिकेन तु संपिष्टा छायाशुष्का भिषग्वर ॥ १६ ॥ वातिके काञ्जिकेनापि पैत्तिके पयसा हिता ॥ श्लेष्मले मूत्रसंयुक्ता पुष्प- स्याञ्जनेके हिता ॥ १७ ॥ भृङ्गराजरसेनापि त्रिदोषशमने हिता ॥ हरीतकी वचा कुष्ठं पिप्पली मरिचानि च ॥ १८ ॥ विभीतकस्य मज्जा वा शङ्खनाभिर्मनःशिला ॥ एतानि सम- भागानि अजाक्षीरेण पेषयेत् ॥ १९ ॥ नाशयेत्तिभिरं कण्डू- पाटलान्यर्बुदानि च ॥ हन्ति पुष्पं सपटनं रात्र्यन्धञ्च निय- च्छति ॥ २० ॥ क्षताभिघाति शोकेन अग्निदग्धं च वा पुनः ॥ काचञ्च नीलिका चैव सिद्धिमिच्छन्ति नेत्रयोः ॥ २१ ॥ अपथ्य आहारविहार करनेसे नेत्रमें फूला होजाता है। एक तो सुखसाध्य होता है और दूसरा कष्टसाध्य होता है ॥ १४ ॥ और तीसरा शस्त्रसाध्य होता है, चौथा असाध्य होता है ॥ १५ ॥ हे उत्तमवैद्य ! शंखपुष्पी, लोध, शंखकी नाभि इनको कांजीमें पीस छायामें सुखा ॥ १६ ॥ उस अंजनको वातके फुलेमें कांजीके संग और पित्तमें दूधके संग कफकेमें गोमूत्रमें घिस नेत्रमें घालना हित है ॥ १७ ॥ त्रिदोषसे उपजे फूलेमें भंगरेंगे रसके संग घालै और हरड़ै, वच, कूठ, पीपल, मिर्च ॥ १८ ॥ बहेड़ेकी मज्जा, शंखकी नामि,