हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-यदि पहिले महीनेमें गर्भ चलायमान दीखे तो मुलहटी, मुनक्का, दाख, चंदन, लाल चंदन ॥ १ ॥ इनको दूधमें घोल पीनेसे गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ २ ॥ दूसरे महीनेमें गर्भ चलायमान होजावे तो कमलकी नाली, नागकेशर इनको देवे और तीसरे महीनेमें गर्भ चलायमान हुआ दीखे ॥ ३ ॥ तो मूसाकी बीटको, खांड और दूधके संग पीवे और चौथे महीनेमें जो दाह हो, तृषा हो, शूल हो ॥ ४ ॥ और ज्वरसे स्त्रियोंका गर्भ चलता हुआ मालूम होवे तो खश, चंदन, नागकेशर, धायके फूल, खांड, घृत, शहद, दहीको पिलावे और पांचवे महीनेमें गर्भ चलता हुआ दीखे तो अनारके पत्ते, चंदन, दही, शहद, इनको पिलावे, छठे महीनेमें गेरू, काली मृत्तिका, गोबर, आरनोंकी भस्म इनको जलमें घोल छानके दालचीनी, चंदन, खांड, ये मिला पीवे और सातवें महीनेमें गोखरू, लज्जावंती, पद्माक, नागरमोथा, खश, नागकेशर, शहद, इनको पिलावे और आठवें महीनेमें लोध, शहद, पीपली इनको पीवती हुई स्त्रियोंका चलायमान गर्भ स्थिर रह जाता है और सुख होता है ॥ ५ ॥ इति वेरीनि ० हारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने चलितगर्भचिकित्सानाम पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥ एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१. अथ गर्भोपद्रवचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ हृल्लासच्छर्दिशोषश्च ज्वरः शोफस्तथारुचिः ॥ विवर्णत्वमतीसारोऽष्टौ गर्भोपद्रवास्स्मृताः॥१॥वक्ष्यामि भेषजं तस्य यथायोगेन साम्प्रतम् ॥ वटप्ररोहं मगधामशीरं घनमेव च ॥ २ ॥ युता खण्डगुटिकास्ये विहिता शोषवारिणी॥३॥ वत्सकं मगधा शुण्ठी तथा चामलकीफलम् ॥ युक्तं कोमलबि- ल्वेन दध्ना पिष्टं तु दापयेत्॥४॥ शर्करासंयुक्तं पानं स्त्रीणां गर्भे हितं सदा॥५॥ पीतो भूनिम्बकल्कश्च शर्करासम्भावितः ॥ छर्दिं हरेच्च हृत्क्लेदं मधुना वा समन्वितः॥६॥शृङ्गवेरं सकटुक मातुलुङ्गस्य केशरम्॥मार्जनं दन्तजिह्वासु गण्डूषश्वोष्णवा- रिणा ॥ ७ ॥ गुर्विणीनाञ्च सर्वासामरुचिं च नियच्छति ॥ वत्सकं दाडिमं पाठा बिलबिल्वबलास्तथा॥८॥ जम्ब्वाम्रपल्ल-