हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वययामोर्ध्वं कुलत्थयूषं व सोष्णं पाययेत् ॥ तृतीयदिवसे पञ्चकोलयवागूर्दापयेत् ॥ चतुर्जातकमिश्रा यवागूर्दापयेत् ॥ पञ्चमेऽहनि शालिषष्टिकौदनं भोजयेत्॥ अनेन क्रमेण दशपञ्च- दशाहं चोपचारयेत् ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-बालक जननेके पीछे लोध, अर्जुनवृक्ष, कदंब, देवदार, बिजौरा, बेरी इनमें जितनी चीजें मिलें उतनी ही लहूकी शुद्धिके वास्ते काथ बनाके देवे इससे प्रसूति स्त्रीकी योनी शुद्ध हो जाती है और तेलकी मालिस कर गरम जलसे पसीना दिलावे । पहले दिन स्त्रीको लंघन करवावे और दूसरे दिन गुड़, सोंठ, हरडे इनको देवे फिर दोपहर पीछे कुलथीका यूष गरम २ देवे और तीसरे दिन पञ्चकोल अर्थात् पीपली, पीपलामूल, सोंठ, चव्य, चीता इनकी यवागू बनाके देवे और चौथे दिन इस यवागूमें चातुर्जातक अर्थात् दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, ये मिलाके देवे और पांचवे दिन शालिसंज्ञक चावलोंके भातका भोजन करे इसी क्रमके अनुसार पन्द्रह दिन पथ्य भोजनका उपचार करना चाहिये ॥ १ ॥ अथ स्त्रीके दूध बढानेके उपाय। पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं घनवालुकम् ॥ कुस्तुम्बुरूणि मञ्जिष्ठां सहक्षीरेण कल्कयेत् ॥२॥पानं क्षीरविशुद्ध्यर्थं कल्क- मश्रात्यनन्तरम् ॥ मरीचं पिप्पलीमूलं क्षीरं क्षीरविवृद्धये ॥ ॥ ३ ॥ मागधी नागरी पथ्या गुडेन सघृतं पयः ॥ पानं जनयते क्षीरं स्त्रीणाञ्च क्षीरपादपि ॥ ४ ॥ एवं कृत्वा च नारीणां द्वादशाहे भिषग्वरः ॥ माङ्गल्यं वाचनं कृत्वा योषा- र्थञ्च प्रदर्शयेत् ॥ ५ ॥ जातके सुतमोक्षञ्च द्वादशाहं तथा पुनः ॥ नामकर्मकृतौ सत्यां कर्णवेधनमेव च ॥ ६ ॥ वस्त्र- बन्धं विवाहञ्च कारयेद्बालकस्य च ॥ ७ ॥ इत्यात्रेय भा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने सूतिकोपचारो नाम त्रिपञ्चा- शत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ पीपल, पीपलामूल, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रवाला, धनियां, मँजीठ इनको दूधमें पीस कल्क बना ॥ २ ॥ इस कल्कको खावे और दूध पीवे ऐसे करनेसे स्त्रीके दूधकी शुद्धि हो जाती है और मिरच, पीपलामूल, इनसे युक्त दूधके पीनेसे स्त्रियोंके दूधकी शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ पीपल, सोंठ, हरड़े, इनको गुड़ घृतसहित दूधमें मिला पीनेसे स्त्रियोंके दूध बढता है ॥ ४ ॥ इस प्रकारके