भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अं० ५ । भाषाटीकासमेता । (: १७ ) विविधजनितवर्णाः 'शालिगो धूमयूषाः ॥ मधुररसविमुक्त्या मानवानां प्रकोपी भवति कफसमीरः स्यात्तदानूपदेशः ॥ ४ ॥ अथ अनूपदेशलक्षण-सुन्दर पानीसे पुष्टहुई बहुतसी सुन्दर नदियां, जलभरे तालाब, हरी दूब, झरनोंसे व्याप्त हुई पृथिवी जहां हो, हरिकुशा तथा पानीसे व्याप्त हुए जो चावलोंके खेतोंसे रमणीक और जहां सूर्य्यकी किरणोंकी संसार इच्छा करता है ॥ ३ ॥ और जहां भारी और मधुर रससे संयुक्त और सब कालमें गीली ऐसी ईख होती हैं और जहां अनेक वर्णोंवाले चावल, गेहूँ और यूष ।म दालका पानी या दो तरहके पात्र उपजते हैं और जहां मधुर रसको खानेसे मनुष्योंके वात और कफका कोप होता है वह अनूपदेश है ॥ ४ ॥ अथ जांगलदेशलक्षण । खरपरुषविशालाः पर्वताः कण्टकीर्णा दिशि दिशि मृगतृष्णा भूरुहाः शीर्णपर्णाः ॥अतिखररविरश्मीपांशुसम्पूर्णभूमिः सरसि रसविहीना कूपकाम्भःप्रकर्षः ॥५॥ तदनु विरससस्याहारिणो गोमहिष्यः प्रभवति रसमांसे रूक्षभावश्च सम्यक् ॥ पुनरपि हिम- वाहं शालिशस्यं न चेक्षुर्भवति रुधिरपित्तं कोपमाशु ह्युपैति ॥६॥ अथ जांगलदेशलक्षण-तीक्ष्ण, कठोर, बडे और कांटोंसे व्याप्त जहां पर्वत हैं, प्रति- दिशामें जहां मृगतृष्णा होती है, जहां विना पत्तोंके वृक्ष हैं, अति तेज सूर्यकी किरणोंके समान जल जलाती धूलवाली जहां सम्पूर्ण भूमि है, जो भूमि तालाबसे रससे हीन है, और जहां केवल कुयेंके जलसे काम निकलता है ॥ ५ ॥ और जहां विनारसका धान्य खानेवाले गाय- और भैंस हैं और जहां रस और मांसमें रूखापन उपजता है, और शीतलवायु, चावलकी खेती, ईख ये नहीं उपजते हैं और जहां रक्त और पित्त शीघ्र कोपको प्राप्त होता है उसको जांगलदेश कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ साधारणदेशलक्षण । उभयगुणशतं वा नातिरूक्षं न स्निग्धं न च खरबहुलं चेच्चाभितः कण्टकाढ्यम् ॥ भवति च जलकीर्णं नातिशीतं न चोष्णं सम- प्रकृतिसमेतं विद्धि साधारणं च ॥ ७ ॥ अथ साधारणदेश लक्षण-जहां अनूपदेशके और जांगलदेशके बहुतसे लक्षण अर्थात गुण हों और जहां न अति रूखापन हो और न चिकनापन है और जहां तेजकी बहुलता नहीं '१ यूषं चमसांचे कसौ' इत्यमरः । 'चमसचिकसौ पात्रभेदौ' इति महेश्वरः, यूषं मंड इति वैद्यो यथा सुद्रामलकयूषस्तु ग्राही पित्तकफे हितः' । ३ 'क्षिप्तक्षुद्रामीप्सितपृथुपीवरवहुल प्रकर्षार्थाः' इत्यमरसिंहः । ६ ३