हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- हो और जो सब ओरसे कांटोंसे व्याप्त न हो रहा हो और जहां साधारण पानी हो और न अति शीत अर्थात् जाडा हो और न अति गर्मी हो और समानप्रकृतिसे संयुक्त हो तिसको साधारण देश कहते हैं ॥ ७ ॥ अथ कालज्ञान । कालस्तु त्रिविधो ज्ञेयोऽतीतोऽनागत एव च ॥ वर्त्तमानस्तृतीयस्तु वक्ष्यामि शृणु लक्षणम् ॥८ ॥ अथ कालज्ञान-काल तीन प्रकारका है, अतीत अर्थात् बीता हुआ, अनागत अर्थात् आनेवाला, वर्त्तमान अर्थात् वर्तता हुआ इन्होंने लक्षण कहताहूँ तुम सुनो ॥ ८ ॥ कालका स्वरूप । कालःकालयते लोकं कालःकालयते जगत् ॥ कालःकालयते विश्वं तेन कालो विधीयते ॥९॥ कालस्य वशगाःसर्वे देवार्षि- सिद्धकिन्नराः ॥ कालो हि भगवान्देवः स साक्षात्परमेश्वरः ॥१०॥ सर्गपालनसंहर्त्ता स कालःसर्वतः समः॥ कालेन काल्यते विश्व तेन कालो विधीयते ॥ ११ ॥ काल लोककी संख्या करता है, काल जगत्की संख्या करता है, काल विश्वकी संख्या करता है, इससे काल कहाता है ॥ ९ ॥ सब देव, ऋषि, सिद्ध, किन्नर, ये सब कालके वशमें हैं और भगवान् देव साक्षात् परमेश्वर ऐसा काल ही है ॥ १० ॥ सृष्टि, स्थिति, संहार, इन्होंने करनेवाला और सब जगहसे समान ऐसा काल ही है, कालसे विश्व संख्याको प्राप्त होता है इससे काल कहाता है ॥ ११ ॥ उत्पादक-कालका स्वरूप । येनोत्पत्तिश्च जायेत येन वै कल्पते कला ॥ सत्त्ववांस्तु भवेत्कालो जगदुत्पत्तिकारकः ॥ १२ ॥ जिससे प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है, जिससे कलायें कल्पित होती हैं और जो बलवान् है, जगत्को अर्थात् पञ्चमहाभूतादिको जो बनाता है वही काल है ॥ १२ ॥ प्रवर्त्तक-कालका स्वरूप । यः कर्माणि प्रपश्येत प्रकर्षं वर्त्तमानके ॥ सोऽपि प्रवर्त्तको ज्ञेयः कालः स्यात्प्रतिकाल्कः ॥ १३ ॥ जो वर्तमानके कर्मोंको देखता है और उनके अनुकूल आगेके लिये भविष्यत् के निर्माण करता है, एक दूसरेके बाद आनेवाला वह काल प्रवर्त्तक काल कहलाता है ॥ १३ ॥