भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अ०४ ] भाषाटीकासमेता । (१९) संहार-कालका स्वरूप । येन मृत्युवशं याति कृतं येन लयं व्रजेत् ॥ संहर्त्ता सोऽपि विज्ञेयः कालः स्यात्कलनापरः ॥ १४ ॥ जिस काल करके जीव मृत्युके वशको प्राप्त होता है और जिस करके कृत अर्थात् किया हुआ कार्य लयको प्राप्त होता है वही काल संहार करनेवाला जानना, यही काल ग्रास करनेवाला है ॥ १४ ॥ कालका सनातनत्व । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ कालः स्वपिति जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥ १५ ॥ काल ही जीवोंको रचता है, काल ही प्रजाको हरता है, काल ही शयन करता है, काल ही जागता है, क्योंकि काल दुरतिक्रम है अर्थात् उल्लंघन नहीं किया जाता ॥ १५ ॥ कालका नाशकस्वरूप । काले देवा विनश्यन्ति काले चासुरपन्नगाः ॥ नरेन्द्राः सर्वजीवाश्च काले सर्वं विनश्यति ॥ १६ ॥ काल अर्थात् समयमें देवता नष्ट हो जाते हैं और कालमें ही दैत्य और सर्प नष्ट होते हैं राजा ही क्यों सब जीव कालमें ही नष्ट होते हैं, कालमें संपूर्ण नष्ट होता है ॥ १६ ॥ अथ अन्यकालोंके स्वरूप । त्रिकालात्परतो ज्ञेय आगन्तुर्गतचेष्टकः ॥ सूक्ष्मोऽपि सर्वगः सर्वैर्व्यक्ताव्यक्ततरः शुभः ॥ १७ ॥ तथा वर्षाहिमोष्णाख्या- स्त्रयः काला इमे मताः॥ तथा त्रयोऽन्येऽपि ज्ञेया उदयमध्या- स्तमेव च ॥ १८ ॥ आगंतुक किन्तु चेष्टासे रहित, सूक्ष्म होनेपर भी सर्वगत, सबसे अतिव्यक्त होकर भी अत्यंत अव्यक्त और शुभ ऐसा काल त्रिकालसे परे जानना चाहिये ॥ १७ ॥ वर्षा, शीत, गर्मी ये तीन काल माने गये हैं और उदय, मध्य, अस्त ऐसे तीन अन्य भी काल जानने ॥ १८ ॥ अथ ऋतुचर्या । वर्षा शरच्च हेमन्तः शिशिरश्च वसन्तकः ॥ ग्रीष्मोऽतिक्रमतो ज्ञेय एवं षडृतवः स्मृताः ॥ १९ ॥ पृथक्पृथक् प्रवक्ष्यामि