भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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(२०) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- रवेर्गतिविशेषणैः ॥ प्रकोपं शमनं ज्ञात्वा अयने द्वे स्मृते बुधैः ॥ २० ॥ दक्षिणायनमेकं स्याद्द्वितीयं चोत्तरायणम् ॥ अथ ऋतुचर्या-वर्षा, शरद्, हेमंत, शिशिर, वसंत और ग्रीष्म एक दूसरेके बाद आने- वाले क्रमसे छः ऋतु कहे हैं ॥ १९ ॥ इन ऋतुओंको पृथक् पृथक् कहूंगा । सूर्यकी गतिके विशेषसे प्रकोप और शमनको जान पंडितोंने दो अयन कहे हैं ॥ २० ॥ एक दक्षिणायन होता है दूसरा उत्तरायण होता है ॥ अयनोंका वर्णन । वर्षा शरच्च हेमन्तो दक्षिणायनमध्यगाः ॥ २१ ॥ शिशिरश्च वसन्तश्च ग्रीष्मः स्यादुत्तरायणे ॥ वर्षा, शरद्, हेमंत ये तीन ऋतु दक्षिणायनमें होते हैं ॥ २१ ॥ शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, ये तीन ऋतु उत्तरायणमें होते हैं ॥ दक्षिणायनका लक्षण । याम्ये गतिर्यदा भानोस्तदा चान्द्रगुणा मही ॥ २२ ॥ वारि शीतलसम्भूतं शीतं तत्र प्रजायते ॥ बलिनो मधुरास्तिक्ताः कषायास्तु विशेषतः ॥२३॥ जीवानां सात्म्यमतुलमोषधीनां च वीर्यता ॥ आर्द्रत्वं भूधराणाञ्च दिशश्चाप्यतिशीतलाः २४॥ सक्लेदा पृथिवी सर्वा तस्मादार्द्रा सफेनिला।कथं चिकित्सयेत् पित्तं कोपं याति विलीयते ॥ २५ ॥ तस्मादृतुविपर्य्यासाद्रु- पचारेण शाम्यति ॥ जब सूर्यकी गति दक्षिणमें होती है तब चंद्रमाके गुणोंवाली पृथिवी हो जाती है ॥२२॥ और शीतल पानी हो जाता है और शीत पडने लगता है और मधुर तिक्त कसैला ये रस विशेष करके बलवाले हो जाते हैं ॥ २३ ॥ और ओषधी अर्थात् अन्न आदिकोंकी तथा जीवोंकी प्रकृति बहुत ही अच्छी रहती है और पर्वत भी गीले होजाते हैं और दिशाभी अति शीतल हो जाती हैं ॥ २४ ॥ क्लेदभावसहित संपूर्ण पृथिवी हो जाती है और इसी कारणसे गीली और झागोंवाली पृथिवी होजाती है इसमें कभी पित्त कोपको प्राप्त हो जाता है और लीन होजाता है २५ ॥ इस कारणसे कि विपर्य्यास करके चिकित्सासे पित्त शांत होता है ॥