हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४] भाषाटीकासमेता । (२१) उत्तरायणका लक्षण । यदोदीच्यां गतिर्भानोस्तदा सूर्यो जलाधिपः ॥ २६ ॥ तस्मादुष्णगुणास्तीव्राः सम्भवन्ति विदाहिनः ॥ खरसूर्यां- शुजालैस्तु शुष्यते वनकाननम् ॥२७॥ संशुष्का मेदिनी सर्वा दिशः पानादनीरसाः॥बलिनोऽम्लकषटुक्षाराः सम्भवन्ति विदा- हिनः ॥ २८ ॥ तस्मात्संंकुप्यते पित्तं रक्तेन सह मूच्छितम् ॥ संशुष्क ओषधिरसो गोजातीनां पयांसि च ॥ २९ ॥ अल्पं बलं च जन्तूनां कथञ्चित्कफसम्भवः ॥ दृश्यते च वसन्ते च स्वयमेव शमं व्रजेत्॥३०॥ एवं ज्ञात्वा सुधीः सम्यक्कुर्यात्सर्व- प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥ जब उत्तर दिशामें सूर्य्यकी गति होती है तब सूर्य्य जलोंका स्वामी हो जाता है ॥ २६ ॥ इसलिये उष्णगुणवाले तीव्र और विदाही पदार्थ होते हैं ॥ २७ ॥ और संपूर्ण पृथिवी सूख जाती है और जल आदिसे रहित सब दिशा हो जाती हैं और खट्टा, चर्चरा, खारा ये रस बलवाले और विशेष करके दाहको करनेवाले होते हैं ॥ २८ ॥ उससे रक्तके साथ मूच्छित हुआ पित्त कुपित होता है और ओषधियोंका रस और गाय आदिका दूध सूख जाता है ॥ २९ ॥ और जीवोंमें अल्प बल उपजता है और कदाचित् कफकी भी उत्पत्ति होजाती है और वहां कफकी उत्पत्ति वसंत ऋतु अर्थात् चैत्र वैशाखमें दीखती है और आप ही शांत हो जाती है ॥ ३० ॥ ऐसे अच्छी तरह वैद्य जानके सब रोगोंकी चिकित्साको करे ॥ ३१ ॥ अथ वर्षर्तुका लक्षण । सघनवारिद्वारिसमाकुला अखिलवत्प्रवरोदकपूरिताः॥समद्- वातकरा विदिशो दिशः प्रमुदितक्रिमिकीटभृता मही ॥३२॥ नीलसस्यहरितोज्ज्वला मही कुल्यका सलिलसंप्लुता नवा ॥ इन्द्रगोपकविराजिता वरा पङ्कभूषणविभूषिता धरा ॥ ३३ ॥ उद्भिन्नचूताङ्कुरभूधरः स्याद्वेजे वनं वा मधुरं व्यकूजन् ॥ भृङ्ग मयूरा जलदस्य घोषं सर्वेऽपि जीवा बलमाप्नुवन्ति॥३४॥केकी कूजति कानने च सरसी म्लानाम्बुपूर्णा तथा हंसा मानसमात्र- जन्ति कमलान्यम्म्लानतां यान्ति च॥गर्जन्मेघमहेन्द्रकन्दर-